तीन साल तक करनैलगंज इलाके को अपनी त्रासदी से मुक्त रखने वाली घाघरा नदी ने एक बार फिर से अपना रुख करनैलगंज की ओर कर लिया है। नदी के बहाव में आए 35 डिग्री के बदलाव से इसका पानी परसावल गांव से पहले मांझा रायपुर में ही सीधे बांध से ठोकर खा रहा है।
इससे न सिर्फ बांध को मजबूत रखने वाले उसके तीन स्पर कटकर नदी में समाहित हो चुके हैं, बल्कि बांध का भी पांच मीटर हिस्सा नदी में समा चुका है। ऐसे में देर-सबेर किसी भी वक्त बांध कटने के डर से करनैलगंज इलाके के 72 गांव और उससे जुड़े 600 मजरों में कोहराम की स्थिति पैदा हो गई है।
वहीं इलाकाई लोगों को बाढ़ से सुरक्षित रखने वाले जिला प्रशासन के पास अब एनडीआरएफ की टीम को बुलाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा है। पेश है रिपोर्ट-
घाघरा नदी से आने वाली बाढ़ बीते सात वर्षों में करनैलंगज और तरबगंज इलाके में 100 से ज्यादा लोगों को निगल चुकी है। बाढ़ में सबसे ज्यादा मौतें करनैलंगज इलाके में हुई हैं। जबकि फसल नुकसान के मामले में हर साल ही करनैलगंज व तरबगंज तहसील की 28 हजार हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित होती रहती है।
बीते सात वर्षों में एल्गिन ब्रिज-चरसड़ी व भिखारीपुर-सकरौर बांध अब तक 3-3 बार कट चुके हैं। जुलाई 2007 में पहली बार भिखारीपुर-सकरौर बांध के कटने के बाद 24 अगस्त 2008 को फिर से भिखारीपुर-सकरौर बांध कट गया। जबकि 28 अगस्त 2010 को एल्गिन ब्रिज चरसड़ी बांध कटने के बाद 17 सितम्बर 2010 को ही भिखारीपुर-सकरौर बांध भी कट गया।
इसके बाद 30 जुलाई 2011 को एल्गिन-चरसड़ी बांध मांझा रायपुर गांव के नजदीक कटा था। चार साल बाद फिर से पुराने बांध से कई मीटर दूर बने रिंग बांध पर घाघरा की कटान का संकट मंडरा रहा है।