नवाबगंज (गोंडा)। किसानों को पारंपरिक खेती के साथ ही सहफसली खेती को भी अपनाना चाहिए। एक ही सीजन में एक ही खेत में सह फसली खेती से कई फसलों का उत्पादन किसानों में समृद्धि लाएगी। खेती से देश-विदेश में उत्तर प्रदेश का नाम रोशन करने वाले सहारनपुर के प्रगतिशील किसान पद्मश्री सेठ पाल सिंह बृहस्पतिवार को नंदिनी कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए और ये बातें उन्होंने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में कहीं।
उन्होंने कहा कि हमेशा से ही उनका जोर कृषि के विविधिकरण पर रहा है। गन्ने की खेती में सह फसली के तौर पर प्याज, मटर, सरसों और खीरा आदि की बाेआई वे करते हैं। इससे उनके आय में काफी इजाफा होता है। सब्जी की खेती से उनका ज्यादा जुड़ाव है। बताया कि मचान लगाकर इसकी खेती करने से ऊपर लौकी, कद्दू के साथ दो तीन प्रकार की सब्जी जमीन पर पैदा हो जाती है। 21 मार्च 2022 में भारत सरकार से पद्मश्री से नवाजे गए सेठ पाल सिंह ने बताया की फसलों के पराली के अपशिष्ट प्रबंधन से खेतों में जीवाश्म और कार्बन पैदा होते है, जो मिट्टी में उपज क्षमता को बढ़ाते हैं।
फसलों के बेहतर उत्पादन के लिए रसायनिक उर्वरकों के बजाए जैविक फफूंद और वर्मी कंपोस्ट के उपयोग पर जोर दिया। कहा कि मृदा के प्राकृतिक संतुलन के लिए रसायनिक खादों का इस्तेमाल कम से कम हो। श्री अन्न मोटा अनाज के बाबत उन्होंने कहा इसके उत्पादन में केमिकल से बने खादों की जरूरत नहीं है। मोटे अनाज पारंपरिक अनाज गेंहू-चावल के तुलना ज्यादा खनिज तत्व और फाइवर से भरपूर होने से पौष्टिकता से भरपूर होते हैं। जैविक विधि से इन अनाजों का उत्पादन कर किसान अधिक आय को बढ़ा सकते हैं।