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सबके साथ बैठ गांवों के विकास का खींचा खाका

Wed, 01 Jun 2016 11:40 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/गोंडा
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डीएम ने गांव के संगठित विकास का पढ़ाया मूलमंत्र
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डीएम कैंप कार्यालय में सुबह आठ बजे से पहले ही बटौरा बख्तावर सिंह गांव के प्रधान विनोद सिंह, पंचायत सचिव, लेखपाल, रोजगार सेवक, बीट सिपाही व सफाई कर्मी डीएम के टेबल पर बैठे थे। जैसे ही डीएम कमरे में घुसे सभी लोग खड़े हुए।
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इस पर डीएम ने आपत्ति जताई कि वे यहां डीएम की हैसियत से आपके सामने नहीं हैं। कुछ जानने, कुछ बताने तथा कुछ आपसी तालमेल के जरिए सामंजस्य बैठाने के लिए हम सब एकत्र हैं। तीन स्तर पर संचालित सरकार में आप तीसरी श्रेणी में आते हैं।

ऐसे में हम सबका दायित्व हैं कि यदि संगठित होकर विकास करना है तो इसके लिए आपसी सौहार्र्द, समन्वय व तालमेल जरूरी है। जिलाधिकारी आशुतोष ने बुधवार को डीएम आवास स्थित कैंप कार्यालय पर कॉफी विद कलेक्टर कार्यक्रम में पहले ग्राम प्रधानों से विकास कार्यों की जानकारी ली।
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इसके बाद विकास, भूमि विवाद और कानून व्यवस्था पर सबसे निचले स्तर के कर्मचारियों की रिपोर्ट सामने रख कर जानकारी लेना शुरू किया। डीएम ने पहले ग्राम पंचायत अधिकारी पुष्पराज सिंह से गांव के विकास पर की गई कार्रवाई, उसमें आ रही अड़चन के बारे में जानकारी ली। इसके बाद एक-एक कर काम के बारे में पूछा और बाद में कहा कि यदि सब कुछ गांव में ठीक होता तो उन्हें यहां बुलाने की क्या जरूरत थी।

इसी तरह लेखपाल मुन्ना लाल मिश्र से राजस्व विवाद, चक मार्ग व अन्य सरकारी जमीनों पर कब्जे के बारे में जानकारी ली। बीट सिपाही देवमणि यादव से कानून व्यवस्था के बारे में पूछा। सभी लोगों ने अपनी जानकारी के हिसाब से बताया।

लेकिन जब डीएम ने सिपाही से पूछा कि क्या उनके पास रोजगार सेवक का नंबर है। तो सिपाही ने बताया कि नहीं। उन्होंने इस पर प्रधान, सचिव, लेखपाल, रोजगारसेवक, चौकीदार आदि के समन्वय के बारे में बताया कि उनका तालमेल क्यों आवश्यक है। भूमि विवाद से लेकर आवास निर्माण तक, अराजक तत्वों के बवाल करने से लेकर बड़ी वारदातों के होने के पहले कैसे उसे रोका जाए इसके बारे में कई उदाहरण देकर समझाया।


भूमि विवाद के मामले 80 प्रतिशत है। इन्हें गांव पर ही सुलझाया जा सकता है। डीएम अपने ढाई घंटे की इस परिचर्चा में शिक्षक की भूमिका में दिखे और समन्वय पर जोर देते हुए अधिकांश मामलों का निस्तारण गांव में करने पर जोर दिया और बीच-बीच में उदारहण देेते हुए उसके निस्तारण के उपाय भी बताए। सिपाही से पूछा कि कोई वारदात होने से पहले ही उसे कैसे रोका जा सकता है? इस पर सिपाही नहीं बता सका।

डीएम ने बताया कि मानो कोई जुलूस निकलने वाला है और कोई विवाद होने वाला हो लेकिन किसी को जानकारी न हो इसके लिए रोजगार सेवक, लेखपाल व अन्य संभ्रांत लोगों से जानकारी मिल सकती है लेेकिन इसके लिए समन्वय जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब प्रधान के साथ गांव के सभी कर्मचारियों के बीच समन्वय होगा तो हर मुश्किल का हल निकल आएगा।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट लेने को नहीं खर्च करने पड़ेंगे दाम
कॉफी विद कलेक्टर कार्यक्रम में डीएम आशुतोष ने लेखपाल से पूछा कि किसान दुर्घटना बीमा में किसान को क्या-क्या औपचारिकताएं निभानी पड़ती हैं। इस पर लेखपाल ने बताया कि किसान के परिवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट देनी पड़ती है जिस पर उसे 80 रुपये खर्च करने होते हें।

डीएम ने इस पर कहा कि दुखी परिवार के किसान को अब यह नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि पोस्टमार्टम की एक प्रति डीएम के यहां आती है। वह कॉपी संबंधित एसडीएम के यहां भेज दी जाएगी। इससे किसान को अब 80 रुपये देने से बचत होगी और दौड़भाग से बचत होगी।

अधिकारियों को देना होगा जवाब
डीएम ने कहा कि वह सिपाही, लेखपाल व गांव के सेक्रेटरी के हस्ताक्षर से पूरी रिपोर्ट बनवा रहे हैं। इसमें किसी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं। इन्हीं बिंदुओं पर हम जब अधिकारियों के साथ समीक्षा करेंगे तो उनसे उनके अनुपालन के बारे में जानकारी मांगेंगे।

यदि अनुपालन नहीं हुआ तो विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। इसीलिए समीक्षा के एक माह तक अधिकारियों को समय दिया जा रहा है। जिससे अगली समीक्षा में कार्रवाई का भी रास्ता साफ रहे। 
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