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जिगर मुरादाबादी की जयंती: वो शायर जिसने पाकिस्तान के बुलावे को ठुकरा दिया, गोंडा से है ऐसा रिश्ता

Sun, 06 Apr 2025 01:14 PM IST
रोहित मिश्र नंदलाल तिवारी, अमर उजाला गोंडा

सार

Jigar Moradabadi: मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी की जयंती आज है। उनका गोंडा से सीधा नाता है। जिगर मुरादाबादी को पाकिस्तान से कई बुलावे आए लेकिन उन्होंने भारत छोड़ने से मना कर दिया। 
 
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जिगर मुरादाबादी। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी की जयंती आज है। उनका गोंडा से सीधा नाता है। जिगर की स्मृतियों को संजोने के लिए जिगर अदबी सोसाइटी के माध्यम से युवाओं को शेरो-शायरी से जोड़ा जा रहा है। साथ ही साहित्यिक गतिविधियों को एक नया आयाम दिया जा रहा है।
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पेशे से शिक्षक व शायर जमशेद वारसी का कहना है कि जिगर मुरादाबादी राजभक्त शायर थे। पाकिस्तान से बहुत सारे आफर आए थे, लेकिन उन्होंने वहां की पेशकश को ठुकरा दिया था। आज भी लोगों की जुबां पर जिगर की रचनाएं है।

साहित्यकार सूर्य प्रसाद मिश्र का कहना है कि जिगर मुरादाबादी दुनिया को बड़ी बारीकी से देखते थे। तभी तो वह कहते हैँ कि- आदमी आदमी से मिलता है, दिल मगर कम किसी से मिलता है। उनकी रचनाओं में गजब की शोखी और मस्ती है। उन्होेंने जिंदगी को अपने तरीके से जिया। गुलशन परस्त हूं मुझे गुल ही नहीं अजीज, कांटों से भी निबाह किए जा रहा हूं मैं। कविता व समालोचना में उनकी विशेष पैठ थी। उनकी गजलों की भाषा सहज एवं सरल है। वे हिंदी व उर्दू दोनों का समान रूप से प्रयोग करते थे।
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एक नजर जिगर मुरादाबादी पर
जिगर मुरादाबादी का पूरा नाम अली सिकंदर है। छह अप्रैल 1890 को उनका जन्म हुआ था। मुरादाबाद में परवरिश के बाद चश्मे के कारोबार के सिलसिले में वह गोंडा आए। यहां पर उन्होंने शेरो-शायरी शुरू की। आतिश-ए-गुल के लिए उन्हें 1958 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी अन्य रचनाओं में शोला-ए-तूर, कुल्लियात-ए-जिगर, दागे जिगर, नग्मा-ए-जिगर शामिल हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उन्हें ऑनरेरी डॉक्टरेट की उपाधि दी गई। 9 सितंबर 1960 को उनका निधन हो गया। सभासद फहीम सिद्दीकी ने बताया कि जिगर की स्मृति में जिगर इंटर कॉलेज, जिगर मार्केट, जिगरगंज मुहल्ला के साथ ही उनकी मजार भी है।

जिगर की रचनाओं ने लोगों को गजल सिखाया
बज़्मे असगर व जिगर गोंडा के जनरल सेक्रेटरी नजमी कमाल खान का कहना है कि जिगर मुरादाबादी ने उनका जो फर्ज है वो अहले सियासत जाने, मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे...की चंद लाइनों के जरिए आवाम तक मुहब्बत का पैगाम पहुंचाने का काम किया है। जिगर की रचनाओं ने लोगों को गजल लिखना सिखाया। उनकी रचनाएं आज भी लोगों की जुबां पर है। तरन्नुम में शायरी पढ़ने की शुरूआत जिगर ने ही की थी। उनकी गजलों में सौंदर्यबोध के साथ ही सियासत का भी जिक्र रहता था, यह नेताओं के लिए एक सबक का काम करता है।
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जिगर की यादों को सहेजने की मुहिम
जिगर अदबी सोसाइटी के सदर जमील आजमी का कहना है कि जिगर मुरादाबादी ने बचपन से ही शायरी शुरू की थी। उनकी शायरी में मुहब्बत, इंसानियत, सौहार्द एवं गंगा जमुनी तहजीब का आईना है। उनकी शायरी में तसव्वुफ का जो रंग है, वह असगर साहब की सोहबत का असर है। उनकी स्मृतियों को संजोने के लिए सोसाइटी के माध्यम से वर्ष भर अलग-अलग कार्यक्रम होते रहते हैं। बताया कि मुजीब सिद्दीकी, अमिल गोंडवी, असलम हाशमी, अज्म गोंडवी, नजमी कमाल बदायूंनी, अफसर हसन (रहबर गोंडवी), ईमान गोंडवी, आतिफ गोंडवी, हैदर गोंडवी, मुशीर मैकश, शौहर गोंडवी, अभिषेक श्रीवास्तव, इमरान मसूदी, अल्हाज गोंडवी जिगर की स्मृतियों को एक नया आयाम दे रहे हैं।
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