गोंडा। राममंदिर भूमि को मुक्त कराने के लिए गोंडा की धरती ही पहला स्थान है जहां पर रणनीति तय की गई थी। बलरामपुर के राज भवन में राम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए बनी रणनीति के नायकों में बलरामपुर के राजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद के संस्थापक व धर्म सम्राट स्वामी करपात्री महराज, गोरक्षपीठ के महंत दििग्विजय नाथ और जिला मजिस्ट्रेट केके नायर थे। 22-23 दिसंबर 1949 की रात मंदिर के अंदर भगवान श्रीराम की मूर्ति का प्राकट्य भी इन्हीं चार पुरोधाओं की सफल रणनीति का हिस्सा थी।
राम मंदिर निर्माण के विवाद का इतिहास पांच सौ वर्ष पुराना है। वर्ष 1528 में तत्कालीन मुगल शासक बाबर द्वारा श्रीराम जन्म भूमि राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी, जबकि हिंदुओं के पौराणिक ग्रंथ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इससे दो वर्ष पूर्व ही 1526 में भारत में मुगलकाल शुरू हुआ था। मुगल वंश का संस्थापक मुगल शासक बाबर था। मुगल शासन 17वीं शताब्दी के अंत और 18वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ। जब तक देश पर मुगल शासकों का शासन रहा तब तक राम भक्तों की आवाज बुलंद नहीं हो सकी।
बलरामपुर के राजभवन में बनी रणनीति
गोंडा जिले के बलरामपुर रियासत के तत्कालीन महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह की हिंदू भावनाओं और लान टेनिस खेल में रुचि के कारण गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और फैजाबाद (अब अयोध्या) के जिला मजिस्ट्रेट केके नायर सेे मित्रता थी। महाराजा पाटेश्वरी प्राय: धार्मिक यज्ञ आदि का भी आयोजन किया करते थे। इन आयोजनों में उनके यहां साधु-संतों का जमावड़ा होता था। धर्म सम्राट की उपाधि से विभूषित स्वामी करपात्री महाराज से महाराजा पाटेश्वरी की नजदीकियां हो गई। 1947 के शुरुआती महीनों में करपात्री महराज की मौजूदगी में राज भवन में ही अयोध्या में राम जन्मभूमि को मुक्त कराने की रणनीति बनी थी, जिसमें पाटेश्वरी प्रसाद सिंह, गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और राम भक्त तत्कालीन कलेक्टर केके नायर भी शामिल थे। राम मंदिर आंदोलन को गति देने के लिए 1947 में करपात्री महाराज ने बलरामपुर के राजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह के साथ मिलकर अखिल भारतीय राम राज्य परिषद पार्टी की स्थापना की थी। राम राज्य परिषद भारत की एक परंपरावादी हिंदू पार्टी थी। आजाद भारत में इन्हीं चार नायकों की रणनीति के तहत 22-23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में रामलला की एक मूर्ति रहस्यमय ढंग से विवादित स्थल पर दिखाई दी। मूर्ति की उपस्थिति ने हिंदू भक्तों के बीच एक अभूतपूर्व जोश जगा दिया। सरकार ने फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट केके नायर से मूर्ति को हटाने के लिए कहा, लेकिन नायर ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे सांप्रदायिक दंगे भड़केंगे।
कौन थे स्वामी करपात्री
स्वामी करपात्री का जन्म संवत 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वितीया को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में सरयूपारीण ब्राह्मण रामनिधि ओझा एवं श्रीमती शिवरानी के यहां हुआ था। उनका नाम हरि नारायण रखा गया। 09 वर्ष की अल्पायु में महादेवी के साथ हरि नारायण विवाह संपन्न करा दिया गया, किन्तु 17 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग दिया। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा के उपरांत उनका नाम ‘हरिहरानन्द सरस्वती‘ हुआ, किंतु वे करपात्री के नाम से ही प्रसिद्ध थे क्योंकि वे अपने अंजुलि का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे। धर्मशास्त्रों में अद्वितीय विद्वता को देखते हुए उन्हें ‘धर्मसम्राट‘ की उपाधि दी गई। भगवान राम और हिंदू धर्म के प्रति अटूट आस्था ने ही उन्हें राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का आंदोलन छेड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अखिल भारतीय रामराज्य परिषद का गठन किया जो हिंदूवादी राजनीतिक दल के रुप में चर्चित हुई। 07 फरवरी 1982 को करपात्री जी का साकेतवास हो गया।
महंत से नेता बने दिग्विजय नाथ
दिग्विजय नाथ का जन्म 1894 में मेवाड़, उदयपुर राजस्थान के कंकरवा थिकाना में एक राजपूत ठाकुर परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम नान्हू सिंह था। उनके पिता रावत उदय सिंह मेवाड़ प्रेसीडेंसी काउंसिल (महेन्द्र सभा) कंकरवा के अध्यक्ष थे। जब वह 08 साल के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया। तब उन्हें फुले नाथ नामक एक नाथपंथी योगी गोरखपुर के गोरखनाथ मठ में ले आए। नान्हू सिंह मठ में ब ड़े हुए और गोरखपुर के सेंट एंड्रयूज कालेज में पढ़ने चले गए। 1932 में बाबा ब्रह्मनाथ गोरखनाथ मठ के महंत बने और नान्हू सिंह को नाथ पंथ परंपरा में शामिल कर दिग्विजय नाथ नाम दिया। 1935 में उनकी मृत्यु के बाद 15 अगस्त 1935 को महंत के रूप में दिग्विजय नाथ का अभिषेक किया गया। महंत होने के बावजूद, दिग्विजय नाथ ने लान टेनिस खेलने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक गतिविधियों को भी जारी रखा। लान टेनिस के कारण ही उनकी बलरामपुर के महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह और गोंडा के कलेक्टर केके नायर से दोस्ती हुई। महंत दिग्विजय नाथ ने 1949 में राम जन्मभूमि आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और राम जन्मभूमि पर बने बाबरी मस्जिद के अंदर राम मूर्तियों का प्राकट्य हुआ। 1967 में हिंदू महासभा के टिकट पर नाथ गोरखपुर के सांसद चुने गए और साल 1969 में वे ब्रह्मलीन हो गए।
सच्चे राम भक्त केके नायर
केरल के अलेप्पी में 11 सितंबर 1907 को जन्मे और 1930 बैच के आईसीएस केके नायर अगस्त 1946 में गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट बनाए गए। लान टेनिस खेलने के शौक ने उन्हें बलरामपुर के महाराजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह से मिलवाया तो दोस्ती बढ़ी और टेनिस कोर्ट में दोनों की मुलाकातें होने लगीं। जुलाई 1947 में नायर के स्थानांतरण के बाद भी उनके आत्मीय मधुर संबंध बने रहे। इन दोनों का परिचय गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ से हुआ और मित्रता में बदल गया। 22/23 दिसंबर 1949 की रात जब मंदिर के अंदर के हिस्से में भगवान श्रीराम की मूर्ति प्रकट हो गई तब फैजाबाद में डीएम का पद केके नायर ही संभाल रहे थे। 1952 में सेवानिवृत्ति लेने के बाद नायर हिंदुत्व के प्रतीक बन गए और चौथी लोकसभा के लिए वे उत्तर प्रदेश की बहराइच सीट से जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी कैसरगंज से तीन बार जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुंचीं। उनका ड्राइवर भी उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य बना।
161 फिट ऊंचा बनेगा भव्य राम मंदिर
पांच अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भूमि पूजन के साथ ही 120 एकड़ क्षेत्र में बनने वाले प्रभु श्रीराम का विशालकाय तीन मंजिला मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुसार यह मंदिर साढ़े तीन साल में बनकर तैयार भी हो जाएगा। प्रस्तावित माडल के अनुसार मंदिर 161 फीट ऊंचा होगा और इसमें पांच गुंबद होंगे। इसका परकोटा पांच एकड़ क्षेत्र में विस्तृत होगा। मंदिर में एक मुख्य शिखर सहित पांच उप शिखर होंगे। राम मंदिर के मुख्य द्वार का निर्माण मकराना के सफेद संगमरमर से किया जाएगा। गर्भगृह के ठीक ऊपर 16.3 फीट का प्रकोष्ठ बनाया जाएगा, जिस पर 65.3 फीट ऊंचे शिखर का निर्माण होगा। प्रत्येक तल पर 106 स्तंभ संयोजित होंगे। यह स्तंभ साढ़े 14 से 16 फीट तक ऊंचे और आठ फीट व्यास वाले होंगे। प्रत्येक स्तंभ यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियों से सज्जित होगा। मंदिर के प्रथम तल के गर्भगृह में जहां रामलला की प्रतिमा स्थापित होगी, वहीं दूसरे तल के गर्भगृह में राम दरबार की स्थापना होनी है।