पृथ्वीनाथ मंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग। - संवाद
गोंडा। खरगूपुर से तीन किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वीनाथ मंदिर शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है। यहां एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है। पुरातत्व विभाग की मानें तो कसौटी के काले दुर्लभ पत्थरों से बना यह शिवलिंग 5000 हजार वर्ष पुराना है। माना जाता है कि द्वापर युग में कुंती के पुत्र गदाधारी भीम ने इसकी प्रतिष्ठापना की थी। ये ऊपर तो पांच फुट है मगर धरती के नीचे करीब 64 फुट बताया जाता है।
खरगूपुर के सेवानिवृत शिक्षक वंशीधर पांडेय ने बताया कि धार्मिक मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान महाबली भीम ने इस विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी। जो समय बीतने के साथ धीरे-धीरे जमीन में समा गया था। कालांतर के बाद यहां के स्थानीय निवासी पृथ्वी सिंह को स्वप्न आया कि उनके मकान के नीचे सात खंडों का शिवलिंग दबा है। पृथ्वी सिंह ने खरगूपुर के राजा मान सिंह की अनुमति से खुदाई शुरू कराई तो वहां काले पत्थरों का शिवलिंग मिला। तभी से इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना शुरू हो गई।
इस शिवलिंग की खासियत है कि व्यक्ति चाहे जितना लंबा हो, बिना एड़ी उठाए जलाभिषेक नहीं कर सकता। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी हर मनोकामना पूरी होती है।
मंदिर के पुजारी जगदंबा प्रसाद तिवारी ने बताया कि यहां आसपास के करीब एक दर्जन जिलों के अलावा पड़ोसी देेश नेपाल से हर साल करीब चार हजार श्रद्धालु भोलेनाथ के दर्शन करने आते हैं। सावन मास व अधिमास में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। नेपाल से आने वाले भक्तों के ठहरने के लिए धर्मशाला की व्यवस्था भी है।