गोंडा। जिले में बढ़ रहे प्रदूषण ने जिंदगी की रफ्तार को कम करना शुरू कर दिया है। आधुनिकता की दौड़ में हम जरूर आगे बढ़े हैं पर आयु में कमी आई है। इसका मूल कारण पर्यावरण में बढ़ रहा प्रदूषण है। जल प्रदूषण, वायू प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण ऐसे कारक बन गए हैं जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है। पर्यावरण प्रदूषण के चलते भाग दौड़ की जिंदगी ने जिले की 40 लाख आबादी की आयु को करीब साढ़े आठ साल कम कर दी है। यह चौंकाने वाला तथ्य शिकागो यूनिवर्सिटी की शोध संस्था एपिक ने उजागर किया है। अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय की शोध संस्था एपिक (एनर्जी पालिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) ने वर्ष 1998 से 2016 तक गंगा के मैदानी इलाकों पर बढ़ रहे प्रदूषण पर शोध किया।
शोध में वायु प्रदूषण में 72 प्रतिशत की बढ़ोतरी पाई गई। शोध में यह भी मिला कि पर्यावरण में सूक्ष्म धूलकण दस माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से चार से पांच गुना अधिक है, जबकि 2.5 पीएम की मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होना चाहिए। बढ़ते प्रदूषण का असर यह है कि लोगों की औसत आयु में कमी आई है। खासकर देवीपाटन मंडल के चार जिलों में गोंडा में अधिक प्रदूषण है। वाहनों से निकलने वाले धुएं वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। जिले में करीब 2200 ऐसे वाहन हैं जो अनफिट हैं।
चार चीनी मिलों, करीब 200 ईंट भट्ठों की चिमनियों से निकलता धुआं स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है। जिले के दो जिला स्तरीय व 66 अन्य सरकारी अस्पतालों तथा करीब 300 एएनएम सेंटरों सहित सैकड़ों क्लीनिकों, निजी अस्पतालों, गाइनो सेंटर, नर्सिंगहोम, 200 से अधिक पैथालॉजी सेंटरों से निकलने वाले सैकड़ों क्विंटल बायो मेडिकल कचरा खुले आम फेंका जाता है। बायोमेडिकल कचरे के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है।
शहर में करीब दो लाख आबादी रहती है। इनके यहां से निकलने वाले वेस्ट पानी खुली नालियों व नालों के जरिए शहर के ही तालाबों में गिराया जाता है। जिससे शहर के तालाब प्रदूषित हो चुके हैं और इनके कारण शहरी क्षेत्र पेयजल भी शत-प्रतिशत प्रदूषित हो चुका है। इसके अलावा सैकड़ों वाहनों, लाउडस्पीकरों, जनरेटर के संचालन ने वातावरण में ध्वनि प्रदूषण को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है। करीब 23 प्रतिशत लोग शराब, 70 प्रतिशत लोग पान मशाला, 40 प्रतिशत लोग सिगरेट का सेवन करते हैं। यही वजहें है जिससे व्यक्ति का मस्तिष्क स्थिर नहीं रह गया है। चिकित्सक डॉ. आलोक अग्रवाल कहते हैं कि प्रदूषण के कारण लोग बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं। बताया गया गोंडा जिले में करीब 30-40 प्रतिशत लोग ब्लड प्रेशर व शुगर से पीड़ित हैं। करीब 15 लाख लोग विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं।
प्रदूषण के प्रमुख कारण
पेड़ों की अधाधुंध कटान, दूषित पेयजल, धुआं उगलते वाहन, फास्टफूड का सेवन, पान गुटका, शराब, सिगरेट का सेवन, जहरीली गैस, एयरकंडीशन का बढ़ता प्रचलन, फैले कूड़ा, बायो मेडिकल कचरा तथा कुपोषण के शिकार बच्चे व महिलाएं।
उपाय भी हुए पर नहीं दिखा असर
अभी जुलाई व अगस्त में पौधरोपण अभियान चलाया गया। इसमें करीब आठ लाख से अधिक पौधे रोपे गए। लेकिन 50 प्रतिशत से अधिक पौधे देखरेख के अभाव में सूख गए। कई जगह केवल कागजों में पौधे लगाए गए। शासन ने बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए स्वास्थ्य पोषण कार्यक्रम मनाने पर जोर दिया लेकिन केवल बच्चों का वजन कर छोड़ दिया जाता है। यही कारण है कि जिले में करीब 77 हजार बच्चे कुपोषित हैं। कूड़ा प्रबंधन के लिए प्रशासन की ओर से कूड़ादान रखवाया गया है। इसके बावजूद कूड़े को सड़क व नाले के किनारे फेंक दिया जाता है।
बायो मेडिकल कचरा प्रबंधन का है नियम पर नहीं मानता कोई
पर्यावरण संरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 1998 में बायोमेडिकल वेस्ट (प्रबंधन एवं संचालन) का नियम बनाया। इसमें प्रावधान किया गया कि यदि बायो मेडिकल कचरा निस्तारण का उपाय संबंधित द्वारा नहीं किया गया तो उसे पांच साल की सजा और उस पर एक लाख जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि इसके बाद भी नहीं मानते तो प्रतिदिन पांच हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। लेकिन आज तक न किसी पर जुर्माना लगा न बायो कचरा निस्तारण के उपाय किए गए।
बायो कचरा प्रबंधन के ये भी हैं उपाय
बायो मेडिकल वेस्ट रखने के लिए पीला, नीला, लाल व काले बैग को रखने, ढकने तथा निर्धारित स्थल पर जमीन के नीचे दबाने का नियम है। लेकिन यहां शाम को क्लीनिक चलाने वाले, अस्पताल चलाने वाले कूड़े को किसी नाले या खुली जगहों पर फेंक देते हैं।
सीवरेज प्लान भेजा गया पर नहीं मिली मंजूरी
शहरी क्षेत्र में खुले में बह रही नालियों व नालों से निजात के लिए सीवरेज प्लान शासन स्तर से मांगा गया था। प्रशासन ने सीवरेज के लिए प्लान भी भेजा लेकिन शासन स्तर से अभी तक मंजूरी नहीं मिल पाई है जिससे जल प्रदूषण जारी है।
प्रदूषण चेक करने के लिए नहीं है कोई व्यवस्था
जिले में बढ़ रहे वाहनों के निकलते धुएं, चिमनियों से उगलते धुंए, ध्वनि विस्तारक यंत्रों से ध्वनि प्रदूषण, मिलों के नदियों में गिरते प्रदूषित पानी के कारण जल प्रदूषण बढ़ा है। इन्हें चेक करने के लिए जिले में न कार्यालय है न ही किसी अधिकारी की तैनाती है।
अस्पतालों के निरीक्षण को बनाई गई है टीम
बायोमेडिल कचरे के निस्तारण के लिए निर्देश जारी किया गया है। क्लीनिकों व अस्पतालों के निरीक्षण के लिए टीम बनाई गई है जो यह जाकर चेक करेगी कि बायोमेडिकल वेस्ट का प्रबंधन किस तरह से किया जाता है। यदि खुले में कोई इसे फेंकता मिलेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। कुपोषण दूर करने के लिए सुपोषण मेले का आयोजन किया जा रहा है। बच्चों को टीके लगवाए जा रहे हैं। -डॉ. मलिक आलमगीर, प्रभारी सीएमओ गोंडा
प्रदूषण नियंत्रण के दिए गए हैं निर्देश
प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सभी उपजिलाधिकारयों को नामित किया गया है। वाहन के प्रदूषण रोकने के लिए संभागीय कार्यालय को निर्देशित किया गया है। -डॉ. नितिन बंसल, डीएम गोंडा