निजी एवं कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने का सपना संजोने वाले गरीब परिवार के बच्चों को अवसर नहीं मिल पा रहा है। 2011 में प्रभावी हुआ शिक्षा का अधिकार कानून का यहां पालन नहीं कराया गया। इसमें निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीट गरीब बच्चों के लिए आरक्षित की गई हैं।
इस बार डीएम इस नियम का कड़ाई से पालन करवाना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे गरीब बच्चों को ढूंढ निकालने के लिए लेखपालों को लगाया है, जो निजी स्कूलों में पढ़ने की आकांक्षा रखते हैं।
वर्ष 2011 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम में अलाभित समूह व दुर्बल आय वर्ग के 25 प्रतिशत बच्चों का दाखिला गैर सहायता वाले मान्यता प्राप्त निजी व कॉन्वेंट स्कूलों में किये जाने का प्रावधान है। इन बच्चों की पढ़ाई में लगने वाली फीस की प्रतिपूर्ति की भरपाई भी सरकार करती है। लेकिन इसके बाद भी इन स्कूलों के संचालक दुर्बल आय वर्ग के बच्चों का प्रवेश अपने स्कूलों में करने से कतराते हैं।
बेसिक शिक्षा विभाग भी इन बच्चों का प्रवेश निजी स्कूलों में करा पाने में लाचार नजर आ रहा है। जानकारी के अभाव में अभिभावक भी इन स्कूलों तक नहीं पहुंच रहे हैं।
हालत यह है कि इन स्कूलों में दुर्बल आय वर्ग के बच्चों का प्रवेश कराने की समय सीमा बीत जाने के बाद भी बेसिक शिक्षा विभाग अब तक एक भी बच्चे का प्रवेश निजी स्कूलों में नही करा सका है। जिले में इस अधिनियम के पालन की कमान अब जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने खुद सभंल ली है।
उन्होंने निजी स्कूलों में गरीब बच्चों का प्रवेश दिलाने के लिए राजस्व विभाग के लेखपालों को निर्देशित किया है। डीएम के निर्देश के बाद अब लेखपाल अपने-अपने क्षेत्रों के गरीब व अलाभित समूह के बच्चों को चिन्हित करेंगे और उनके अभिभावकों की आय को प्रमाणित कर निजी स्कूलों में उनके दाखिले के लिए आवेदन पत्रों को अग्रसारित करेंगे।
इन आवेदन पत्रों की जांच के बाद निजी स्कूलों में दाखिले के लिए बेसिक शिक्षा विभाग इन बच्चों के नामों का अनुमोदन जिलाधिकारी से कराएगा। इसके बाद सीधे इन नामों की सूची दाखिले के लिए निजी स्कूलों को भेजी जाएगी। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. फतेह बहादुर सिंह ने बताया कि सोमवार तक लेखपालों के माध्यम से 60 आवेदन आ चुके हैं।