गोंडा। समाज में विभिन्न झंझावातों से गुजरने के बाद न सिर्फ पुरुषों ने विकास व उन्नति की इबारत लिखी है, बल्कि महिलाओं ने संघर्षों को पीछे छोड़ कामयाबी हासिल की है। ऐसी कई महिलाएं समाज में बेटियों के लिए प्रेरणा की स्रोत बनी हैं जिन्होंने अकथ कहानी गढ़ कामयाबी हासिल की है। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट-
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तीन छात्राओं से की थी महाविद्यालय की शुरुआत
सरस्वती देवी नारी ज्ञानस्थली महाविद्यालय की संस्थापिका डॉ. कृष्णा सिन्हा का मानना है कि दृढ़ इच्छा व संकल्प से कठिन से कठिन मंजिल की राह आसान हो जाती है। जो महिलाएं अपने को असहाय मानकर संघर्षों से पीछे हटती हैं वह गलत है। संघर्ष हर व्यक्ति को करना पड़ता है। बस उसके अंदर जज्बा और लगन की जरूरत है। कृष्णा सिन्हा बताती हैं कि मुंबई से पढ़ाई करने के बाद जब वह गोंडा अपने घर आईं तो यहां बालिकाओं की उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त शिक्षण संस्थान नहीं थे। उन्होंने बताया कि उनकी दो बेटियों आरती व अनंदिता को उच्च पढ़ाई के लिए विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने संकल्प लिया कि बालिकाओं की शिक्षा के लिए वह ठोस कदम उठाएंगी। विभिन्न संघर्षों के बीच डॉ. कृष्णा सिन्हा ने एक किराए के भवन में वर्ष 1991 में नारी ज्ञानस्थली महिला डिग्री कॉलेज की नींव रखी। तीन छात्राओं से शुरू होने वाले इस महाविद्यालय के पास आज अपना एक भवन ही नहीं, बल्कि मंडल में बालिका शिक्षा के लिए अलग पहचान बना ली है। कृष्णा सिन्हा का कहना है कि इस महाविद्यालय की स्थापना व संचालन को लेकर उन्हें विभिन्न समस्याओं से गुजरना पड़ा, लेकिन उन्होंने संघर्षों के सामने घुटने न टेकने के बजाए उससे डटकर सामना किया और परिणाम सामने है।
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माता-पिता की मौत के बाद भी नहीं डिगे कदम
डेढ़ वर्ष की उम्र में मां को खोने वाली इंदिरा निगम को क्या पता था कि छह वर्ष की आयु में ही उनके पिता भी साथ छोड़कर चले जाएंगे। पिता की मृत्यु के बाद इंदिरा निगम की बड़ी बहन अवधेश्वरी ने उन्हें पाला-पोसा और इंटरमीडिएट तक की शिक्षा दिलाई। इस दौरान इंदिरा निगम को विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ा। पढ़ाई के साथ ट्यूशन पढ़ाकर संघर्षों का सामना करने वाली इंदिरा निगम ने सीपीएड की परीक्षा पास की और सरयू प्रसाद कन्या पाठशाला इंटर कॉलेज में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। इंदिरा निगम ने एनसीसी की गाइड बनीं और उन्हें मेजर की भी उपाधि मिली। वर्ष 1996 में मेजर इंदिरा निगम को राज्य शिक्षक पुरस्कार भी मिला। मेजर इंदिरा निगम बताती हैं कि उन्होंने नौकरी के दौरान अपने भाई-बहन के परिवार के साथ अन्य असहाय लोगों की भी सहायता की। आज भी निर्धन बालिकाओं को शिक्षा के लिए आर्थिक सहयोग करती हैं। उन्होंने बताया कि जीवन में संघर्ष इतने रहे कि अपने विवाह के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला। आज भी वह अपने भतीजा-भतीजी के साथ निर्धन लोगों का सहयोग कर रही हैं।
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विदेशों में भी गूंज चुके हैं प्रज्ञा के सुर
शहर के राधाकुंड मोहल्ले के एक साधारण परिवार में जन्मीं प्रज्ञा पाठक जिला व देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपने सुर का लोहा मनवा चुकी हैं। पं. यज्ञदेव पाठक नीरज गोनर्दीय की पुत्री प्रज्ञा को इस मुकाम पर पहुंचने के लिए विभिन्न समस्याओं व झंझावातों का भले ही सामना करना पड़ा हो, लेकिन उसने अपनी मंजिल को पाने के लिए हर बाधाओं को पार किया। परास्नातक की डिग्री लेने के बाद एक कॉलेज में संविदा पर नौकरी शुरू की। नौकरी के साथ ही गायन को अपना मंजिल मानने वाली प्रज्ञा ने भारतखंडे संगीत महाविद्यालय लखनऊ में प्रवेश लिया। सुबह-शाम ट्रेन से यात्रा कर उसने हर मुकाम हासिल करने का प्रयास किया। प्रज्ञा वर्ष 2005 में बैंकाक (थाईलैण्ड), रंगून (बर्मा) व 2008 में पारो (भूटान), कंबोडिया व एक बार फिर बैंकाक और रंगून में अपना गायन प्रस्तुत कर चुकी हैं। प्रज्ञा के संघर्ष भरी कहानी का परिणाम यह रहा कि वह दूरदर्शन, आकाशवाणी में कई बार गा चुकी हैं। प्रज्ञा का मानना है कि महिलाओं के सामने समस्याएं तो कई होती हैं, लेकिन यदि वह हिम्मत न हारें तो कठिन से कठिन मंजिल की राह आसान हो जाती है।