पुस्तकों की कमी का फायदा उठा रहे निजी प्रकाशक
गोंडा। कक्षा एक से 12 तक राजकीय पुस्तकों की कमी के चलते छात्र-छात्राएं भटक रहे हैं। राजकीय पुस्तकों की कमी का सीधा फायदा निजी प्रकाशक उठा रहे हैं।
सरकार की कम मूल्य में बच्चों को पुस्तकें उपलब्ध कराने की मंशा फेल होती दिखाई दे रही है। प्रदेश के कक्षा एक से आठ तक परिषदीय विद्यालय के बच्चों को नए सत्र के 3 माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अभी तक पुस्तकें नहीं मिल पाई हैं।
निजी विद्यालयों व कॉलेजों में पढ़ने वाले बच्चों को कक्षा 1 से 12 तक की पुस्तकों के लिए भटकना पड़ रहा है। अभी तक परिषदीय विद्यालयों में पुस्तकों का वितरण नहीं हुआ है। कक्षा 9 से 12 तक सरकार ने भले ही किताबों के दाम कम करके छात्र-छात्राओं को बड़ी राहत दी है।
मगर पुस्तकों के लिए छात्र-छात्राओं को भटकना पड़ रहा है। सरकार ने सभी कालेजों व विद्यालयों में एनसीईआरटी की पुस्तकों को लागू तो कर दिया है मगर प्रकाशक पुस्तकों की छपाई नहीं कर पा रहे हैं।
पुस्तक विक्रेताओं को पुस्तकें नहीं मिल पा रही हैं। पुस्तक विक्रेताओं ने यह भी बताया कि एनसीईआरटी व राजकीय प्रकाशन की पुस्तकों में प्रकाशक व थोक व्यापारी फुटकर दुकानदारों को पुस्तकों में कोई भी कमीशन नहीं दे रहे हैं। इसलिए व्यापारी पुस्तक बेचने से कतरा रहे हैं।
कुछ व्यापारी पुस्तको को बेंच तो रहे हैं मगर बच्चों को पुस्तक के साथ रजिस्टर लेने का दबाव बनाते हैं। पुस्तकों का कम प्रकाशन होने से थोक व्यापारी छोटे व्यापारियों को पुस्तक नहीं दे रहे हैं। इससे कॉलेजों में तैनात शिक्षकों व पुस्तक विक्रेताओं की चांदी है।
राजकीय प्रकाशन की पुस्तक लगाने के बजाय वे प्राइवेट प्रकाशन की पुस्तके बच्चों को खरीदने के लिए विवश करते हैं। इनमें राजकीय प्रकाशन की पुस्तक मामूली दामों में उपलब्ध होती हैं, जबकि प्राइवेट प्रकाशन की पुस्तक में सैकड़ों का वारा न्यारा होता है।
राजकीय प्रकाशन की पुस्तक न मिलने के कारण प्राइवेट पुस्तकों को महंगे दामों में खरीदकर पढ़ना छात्र-छात्राओं की मजबूरी बन चुकी है। सरकार ने कक्षा 9 से 12 तक की एनसीईआरटी की पुस्तकों का मूल्य पहले की अपेक्षा बहुत कम कर दिया है।
जैसे जीव विज्ञान की पुस्तक का मूल्य पूर्व में 8 सौ रुपये होता था उसको सब्सिडी देकर सौ रुपये से कम कर दिया है। निजी कॉलेजों के शिक्षक सभी विषयों की निजी प्रकाशकों की महंगी पुस्तकों को लगा कर छात्र छात्राओं को पुस्तक खरीदने को विवश कर रहे हैं।