रोडवेज डिपो गोंडा की हालत दिनोंदिन खस्ताहाल होती जा रही है। यहां डिपो के बेड़े में कहने के लिए कुल 66 बसें हैं, पर इसमें से 45 बसों की हालत ऐसी है कि जिसमें बैठकर सफर करना यात्रियों के लिए किसी बड़ी मुश्किल से कम नहीं है। इसके बावजूद रोडवेज महकमा बसों की हालत सुधारने के बजाय इनसे होने वाली आय को बढ़ाने में जुटा है। यही कारण है कि बसों से यात्रा करने वाले यात्रियों का मोह रोडवेज से भंग होने लगा है।
जिले में बसों के खस्ताहाल होने की एक सबसे बड़ी वजह यहां की सड़कें भी हैं। इस वजह से नई से नई बसें भी एक साल बीतते ही खटारा हो जाती हैं। गोंडा रोडवेज डिपो की ज्यादातर बसें इसी वजह से खराब हुई हैं। रोडवेज सूत्रों की मानें तो आए दिन सड़कों की वजह से बसों का कोई न कोई पुर्जा खराब हो जाता है।
इससे यात्रियों को बीच सड़क रुककर पहले इन्हें धक्का देना पड़ता है, तब जाकर कहीं बस चल पाती है। रही बात नई बसों की तो इसके लिए जिले से जो भी रिक्वायरमेंट मुख्यालय को भेजी गई है। उसकी पैरवी में आ रहीं अड़चनों की वजह से मुख्यालय को कोई नई बस काफी समय से नहीं मिली है।
देवीपाटन मंडल का मुख्यालय होने के बावजूद गोंडा में स्थापित होने वाले आरएम कार्यालय की नींव पहले ही बहराइच जिले में डाली जा चुकी है। इसको लेकर यहां के लोगों में पहले से ही मंडल मुख्यालय की उपेक्षा किए जाने का मलाल है। ऊपर से यहां के बेड़े में जो 66 बसें हैं, जिसमें से 45 बसों की हालत इतनी दयनीय है कि इनमें बैठकर सफर करना यात्रियों की स्वेच्छा कम, उनकी मजबूरी ज्यादा होती है।
क्योंकि बसों में बैठने के लिए न तो फोमयुक्त सीटें हैं और न ही बसों की खिड़की और दरवाजे ही ठीक हैं।
बसों के भीतर खुली वायरिंग से यदा-कदा आग लगने की भी घटनाएं हुआ करती हैं, जिस पर काबू पाने के लिए किसी भी बस में अग्निशमन यंत्र उपलब्ध नहीं है।
यही कारण है कि रोडवेज से यात्रा करने वाले यात्रियों का डिपो के बेड़े से मोहभंग होने लगा है। यात्री रामसुरेश, दिनेश, कमाल खां, प्रदीप, शिवबहादुर, ननकऊ, रामनरेश, दिनेश का कहना है कि उन्हें ट्रेन न चलने के कारण रोडवेज बसों से ही बलरामपुर, उतरौला व अन्य जगहों की यात्रा करनी पड़ती है। बस में यात्रा करना उनकी मजबूरी इसलिए है, क्योंकि उनके पास विकल्प के लिए कोई दूसरा साधन ही नहीं है।