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कहीं जेनरेटर की चकाचौंध तो कहीं उजाले को तरस रहे लोग

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बाढ़ पीड़ितों को मदद के नाम पर धोखा
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जहरीले जीव जंतुओं के खतरे के बीच कट रही रातें
मोमबत्ती या केरोसिन तक नहीं दिया प्रशासन ने
करनैलगंज(गोंडा)। जिला प्रशासन भले ही बाढ़ पीड़ितों को राहत के नाम पर हरसंभव मदद पहुंचाने का दावा करता हो लेकिन जमीनी हकीकत इस दावे के ठीक उलट है। राहत के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद बाढ़ पीड़ितों को रोजमर्रा की चीजें भी नही मिल रही है। अपने घरों से दूर शरणार्थी बनकर बंधे पर रह रहे बाढ़ पीड़ित रात के अंधेरे में जिंदगी बसर कर रहे हैं।
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बाढ़ की तबाही से जान बचाने के लिए अपना घर छोड़ कर हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर तिरपाल के नीचे अंधेरे में जिन्दगी गुजार रहे हैं। जहरीले जन्तुओं के खौफ ने इनकी नींद हराम कर रखी है। हर तरफ पानी ही पानी और सड़क के किनारे पेडों के नीचे अपना आशियाना बनाये बाढ़ पीड़ितों को बच्चों व परिवार की सुरक्षा की चिंता सता रही है। बाढ़ राहत केंद्र पाल्हापुर से महज 50 मीटर की दूरी पर सड़क के किनारे प्रशासन की कृपा से मिले तिरपाल में जीवन यापन करने वाले बाढ़ पीड़ितों का आशियाना शाम होते ही अंधेरे में डूब जाता है। बाढ़ पीड़ितों के पास मोमबत्ती तक नहीं है। यहां बैठी महिलाएं अपनी किस्मत और व्यवस्था को कोस रही थीं। रामसखे यादव, कुमकुम देवी, दीनानाथ, रामेश्वर, शिवशंकर आदि ने बताया कि रोशनी के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। महज छोटी सी टार्च के सहारे पूरी रात बाल-बच्चों की देखभाल करनी पड़ती है। बच्चे जमीन पर सोते हैं। ऐसे में बच्चों की रखवाली के लिए उन्हे रात जागकर बितानी पड़ रही है। वहीं इसी के बगल राहत केंद्र पर अफसरों का जमावड़ा लगा हुआ था। गांव में बाढ़ शरणार्थियों के उपयोग में लिए जाने वाले एक बड़े से दिखने वाले मैदान पर सीएम के आगमन की तैयारी की जा रही थी। अपने एसी कमरों में बैठकर बाढ़ की रिपोर्टिग करने वाले अफसर बुधवार रात हेलीपैड व मंच बनाने में जुटे हुए थे। अंधेरे को दूर करने के लिए जेनरेटर मंगाया गया था। इन्हीं जेनरेटरों की चकाचौंध के बीच तेजी से काम चल रहा था। दर्जनों ट्रालियंा ईंट, बालू व मिट्टी लादकर ला रही थी व सैकड़ों की संख्या में मजदूर काम पर लगे थे। लग्जरी वाहनों से मौके पर मौजूद कई ठेकेदार एंव पीडब्ल्यूडी के अधिकारी काम देख रहे थे। बालू खनन पर रोक के बावजूद बालू से जमीन को समतल किया जा रहा था। इस पूरे काम को रोशनी से मरहूम बाढ़ पीड़ित टकटकी लगाकर देख रहे थे।
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