गोंडा। 47 साल पहले यह तय हो गया था कि आने वाले समय में पेयजल संकट उत्पन्न होगा और लोगों को पीने के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं हो पाएगी। योजनाएं लागू होती रहीं और जिस बात की आशंका इतने वर्षों पहले व्यक्त की गई थी वह आज दिखाई देने लगी है। वर्ष 2011-12 में कराए गए सर्वेक्षण में यह उजागर हो गया था कि पूर्वांचल सहित गोंडा का पानी दूषित हो गया है। इसके लिए शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना जरूरी है। मौजूदा समय 1054 ग्राम पंचायतों में ऐसा कोई गांव नहीं है जहां का पानी शुद्ध हो परंतु सरकारी मशीनरी पर विश्वास करें तो 374 गांव ऐसे हैं जहां का पानी जहरीला हो चुका है। इनमें आर्सेनिक, आयरन, क्लोराइड, फ्लोराइड, नाइट्रेट सहित तमाम अवयव मिले हैं जो बीमारी फैलाने के लिए पर्याप्त हैं। इतना ही नहीं 106 गांव तो ऐसे हैं जहां के पेयजल में 50 से 90 प्रतिशत तक आर्सेनिक की मात्रा घुली हुई है। 37 गांवों के पानी से जेई व एईएस बीमारी के खतरे के लिए अलर्ट किया गया है। 68 गांव में दूषित पानी होने के कारण पाइप लाइन पेयजल योजना शुरू की गई जो धरातल पर नहीं पहुंची। 200 गांवों में पेयजल संदूषित पाया गया। पेयजल के लिए पनप रहे संकट पर अरुण कुमार मिश्र की विस्तृत रिपोर्ट-
भूजल का पहला स्तर पूरी तरह से दूषित
जिले की 1054 ग्राम पंचायतों में करीब 34 लाख से अधिक आबादी बसती है। शहरी क्षेत्र का पानी तो पहले ही दूषित हो चुका है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में इतना दूषित पेयजल है यह चौंकाने वाली स्थिति है। जलनिगम व अन्य संस्थाओं की रिपोर्ट में ही यह साफ है कि भूजल का पहला स्तर पूरी तरह से दूषित हो चुका है। जिले भर में करीब पांच लाख छोटे हैंडपंप लगे हैं। ये हैंडपंप लोगों के घरों में जिसका पानी पूरी तरह से दूषित माना गया है। पानी का दूसरा स्तर कुछ हद तक ठीक है परंतु इसके लिए समरसेबल जैसे पंप की जरूरत है जिसे ग्रामीण नहीं लगवा सकते। गहरी बोरिंग वाले हैंडपंप इंडियामार्का भी अब दूषित पानी देने लगे हैं। पेयजल के लिए गांवों में पहले बने सारे कुओं का अस्तित्व तो खत्म हो चुका है। पीने के लिए मात्र इंडिया मार्का हैंडपंप है जिसमें 40 प्रतिशत हैंडपंप खराब हैं और 20 प्रतिशत हैंडपंप दूषित पानी दे रहे हैं।
106 गांवों में आर्सेनिक की मात्रा अत्यधिक
ग्रामीण पेयजल के लिए संचालित योजनाओं से पहले आई सर्वे रिपोर्ट में जिले की 106 ग्राम पंचायतों का पानी अति दूषित है। इसमें आर्सेनिक की मात्रा बहुत अधिक है। उदाहरण के तौर पर गड़रियनपुरवा, मुरावन पुरवा, पिपरी माझा, तिवारीपुरवा, चमारन टेपरा, कोल्हउर, कन्हैयालाल पुरवा, दखनपुरवा, टेपरा सहित तमाम गांव ऐसे हैं जहां के पेयजल में 50 से 90 फीसदी तक आर्सेनिक की मात्रा घुली हुई है। खासकर ये गांव टेढ़ी नदी, बिसुही के किनारे बसे हैं और टेढ़ी व बिसुही नदी के पानी में चीनी मिलों का रासायनिक पानी मिलता है। इससे इन गांवों की स्थिति बेहद खराब है।
37 गांव तो जेई व एईएस बीमारी पैदा करने वाले
स्वास्थ्य विभाग ने पहले ही जिले के 37 गांव ऐसे हैं जहां के पानी में क्लोराइड, फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन सहित अन्य पदार्थ घुले हैं। इन गांवों के पानी से पनपने वाली बीमारी जापानी इंसेफ्लाइटिस व एईएस है जिसके लिए स्वास्थ्य विभाग पहले ही एलर्ट कर चुका है। इन 37 गांवों में नीर निर्मल परियोजना के तहत पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। वर्ष 2014 में इन 37 गांवों में पेयजल के लिए टंकी, गांवों तक पानी पहुंचाने के लिए पाइपलाइन बिछाने का काम शुरू हुआ। इन गांवों में काम भी लगभग पूरा हो गया लेकिन मामूली जल शुल्क जमा न होने के कारण इनका संचालन भी न के बराबर है।
200 गांव में संदूषित पानी
जिले की 200 ग्राम पंचायतें ऐसी हैं जहां का पानी संदूषित घोषित किया गया है। यानि पेयजल खराब होने के पीछे ग्रामीणों को जिम्मेदार माना गया है। इन गांवों हैंडपंपों के पास दूषित पेयजल का रुकना, शौचालय का सोख्ता, तालाब, नालियों का बहना, कूड़ा करकट वाले स्थान हैं। जहां की साफ सफाई व्यवस्था शून्य है। इन गांवों का पानी भी पूरी तरह से दूषित हो चुका है।
हैंडपंप का पानी भी हुआ जहरीला
शुद्ध पानी देने के दावे वाले इन हैंडपंपों में आर्सेनिक युक्त जहरीला पानी निकल रहा है, जिसका प्रयोग पीने के लिए कतई नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2014 में कराए गए एक सर्वे में इसका खुलासा किया गया था और दूषित पानी देने वाले 1266 हैंडपंपों पर लाल रंग के निशान भी लगवाए गए थे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने इस पर कार्रवाई करने के बजाय आंखें बंद कर लीं। नतीजा यह है कि पिछले दो वर्ष से 343 गांवों के करीब 10 लाख लोग आर्सेनिक युक्त जहरीला पानी पी रहे हैं और बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। जिले में पीने के लिए शुद्ध पानी मिल सके इसके लिए करीब 52 हजार इंडिया मार्का टू हैंडपंप लगवाए गए हैं। लेकिन बोरिंगों की गहराई कम होने के कारण इन हैंडपंपों के पानी में प्रदूषण की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
नीर निर्मल परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2014 में इन हैंडपंपों के पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए सर्वे कराया गया था। इस सर्वे में 343 राजस्व गांवों में लगाए गए 1266 हैंडपंपों का पानी दूषित मिला था। इस पानी में आर्सेनिक, आयरन, फ्लोराइड व नाइट्रेट की मात्रा पाई गई थी। लोग इस पानी का प्रयोग पीने के लिए न करें, इसके लिए इन हैंडपंपों की नंबरिंग कराई गई थी और इस पर लाल रंग के निशान भी लगवाए गए थे, लेकिन जागरूकता के अभाव में लोगों को इसकी जानकारी नहीं हो सकी और इन हैंडपंपों के दूषित पानी का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है।
बिजली का भार कम करने को सोलर सिस्टम
नीर निर्मल परियोजना ने बिजली का भार कम करने के लिए सोलर सिस्टम लागू किया है। पहले चरण की चार परियोजनाओं रामप्रसाद ज्ञानीपुर, लमती उकरहवा, सालपुर धौताल और सरैंया नान्हूं में सोलर सिस्टम से पानी की टंकी और पम्प चलाने की व्यवस्था की गई है। जिससे पंचायतों पर परियोजनाओं को संचालित रखने में ज्यादा धन न खर्च करना पड़े। इसके अलावा दूसरे चरण की 12 परियोजनाओं को शत-प्रतिशत सोलर सिस्टम से जोड़ा गया है। इसके बाद भी आपरेटर रखने और रखरखाव के लिए बजट की व्यवस्था करनी है। 50 रुपए हर महीने जल शुल्क से बजट की व्यवस्था करनी है लेकिन गांव के लोग इस शुल्क को देने को तैयार नहीं हो रहे हैं।
वर्ष 1972 से चल रहा शुद्ध जल मुहैय्या कराने का अभियान
जिले के गांवों में वर्ष 1972 से शुद्ध जल दिए जाने का अभियान चल रहा है। उस समय 80 गांवों का पानी अशुद्ध मिलने पर ग्रामीण पेयजल आपूर्ति की परियोजना चलाई गई और वर्ष 1986 तक संचालित रहा। गांवों में पानी को शुद्ध करने की जानकारी देने के साथ ही हैंडपंप लगाए जाने की कार्रवाई हुई। कुएं खोदे गए, 10 लाख कूप योजना भी आईं जिसमें भी जिला चयनित रहा। इसके बाद पेयजल तकनीकी मिशन के साथ ही नया अभियान आया और हैंडपंपों पर जोर दिया। 1991-92 में राजीव गांधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन से शुद्ध पानी पर जोर दिया गया। वर्ष 1998 में हैंडपंप की स्थापना के मानक में बदलाव हुआ और फिर पेयजल मिशन नए तरीके संचालित हुआ। वर्ष 2001 के बाद जल आपूर्ति के साथ ही जल प्रबंधन की योजनाएं और फिर 2002 में स्वजलधारा योजना से पानी की टंकी के स्थापना की कार्रवाई वर्ष 2011 तक चली। इसके बाद पेयजल मिशन की कई तरह की योजनाएं आईं, जिसमें वर्ष 2014 में विश्व बैंक सहायतित नीर निर्मल योजना शुुरू हुई, साथ ही जल निगम से हैंडपंप के साथ ही ग्रामीण पेयजल मिशन संचालित है। फिर भी लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है।
दूषित पानी से होने वाली बीमारियां
पीने के पानी के दूषित होने से पीलिया, गैस्ट्रो इंटराइटिस, जुकाम, संक्रामक यकृत शोध, चेचक, अतिसार, पेचिस, मियादी बुखार, अतिज्वर, हैजा, कुकुर खांसी, क्षयरोग, मलेरिया टायफाइड, खुजली, नेत्ररोग व पेट के विभिन्न प्रकार के रोगए जिनका स्वास्थ्य पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
रोगों से बचाव के उपाय
-पीने के पानी को उबालकर व स्वच्छ कपड़े से छान कर पिएं।
-पीने के पानी को धूप व प्रकाश में रखें।
-दूषित पानी में तुलसी के पत्तों को डालकर भी पानी शुद्ध किया जा सकता है।
-मवेशियों के लिए अलग-अलग पानी के टैंक की व्यवस्था करें।
-नदियों व नहरों का पानी प्रदूषित होने से बचाएं।
इनसेट
इंडिया मार्का हैंडपंप टू की ब्लॉकवार स्थिति
ब्लॉक कुल हैंडपंप खराब हैंडपंप दूषित पानी वाले हैंडपंप
बेलसर 2720 362 33
करनैलगंज 2028 529 19
झंझरी 4046 596 120
पंडरीकृपाल 2467 292 34
परसपुर 3120 609 41
तरबगंज 2651 312 58
बभनजोत 3082 306 72
छपिया 2776 269 70
हलधरमऊ 2603 412 91
इटियाथोक 2743 328 33
मनकापुर 3616 282 39
मुजेहना 2879 303 35
नवाबगंज 2773 489 25
रूपईडीह 3387 380 18
वजीरगंज 3290 336 49
कटरा बाजार 3421 379 529
शुद्ध जल उपलब्ध कराने के लिए किए गए हैं प्रयास
लोगों को शुद्ध जल मुहैय्या कराने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास हुए हैं। पाइप पेयजल परियोजनाएं पूरी कराई गई हैं। संचालित भी हैं, आम लोगों के सहयोग से योजनाओं का संचालन होना है। इसके लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। जलजनित रोगों के बारे में जानकारी देकर बचाव के तरीके तो बताए ही जा रहे हैं। इसके अलावा पाइप पेयजल परियोजना का लाभ लेने के लिए जल शुल्क जमा करने पर जोर दिया जा रहा है। -सुनित सोनकर, जिला कार्यक्रम प्रबंधक
लोगों का सहयोग जरूरी
शुद्ध पेयजल के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है और पाइप लाइन पेयजल परियोजना पूरी हो गई है। लोगों को सहयोग करके योजनाएं संचालित करनी है। -देवेश मिश्रा, सलाहकार मूल्यांकन