गोंडा। जिला कारागार परिसर में ब्रिटिश काल वर्ष 1919 में बनाए गए 102 आवास समय के साथ जर्जर हो चुके हैं। अंग्रेजों के बनाए इन आवासों को जेल प्रशासन ने डिमालिश कराने की तैयारी की है। इसके लिए लोक निर्माण विभाग से आवासों का मूल्यांकन तय करने के साथ ही निष्प्रयोज्य प्रमाण पत्र मांगा गया है।
ब्रिटिश सरकार के समय वर्ष 1856 में यहां जिला कारागार की स्थापना कराई गई थी। उस समय यहां मात्र छह बैरक ही बनाई गई थी। समय के साथ बंदी बढ़ते गए तो एक-एक बैरक का निर्माण कराया जाने लगा। धीरे-धीरे जेल में बैरकों की क्षमता साढ़े चार सौ बंदियों की कर दी गई। इस बीच कई बैरकें पुरानी होने के कारण ढहाई गई और नई भी बनाई गई। मगर बंदियों की क्षमता साढ़े चार सौ ही है। जबकि यहां साढ़े आठ सौ से अधिक बंदी जेल में बंद हैं।
ब्रिटिश सरकार के समय वर्ष 1919 में जेल परिसर में बंदी रक्षकों के रहने के लिए 102 आवास बनाए गए थे। जिसमें बंदी रक्षक व मिनिस्ट्रीयल कर्मचारी परिवार के साथ रहते थे। मगर 100 साल से अधिक समय बीत जाने के कारण सभी 102 आवास जर्जर हो गए। आवास की कमी के कारण कुछ दिनों पहले तक कुछ कर्मचारी इसी आवास में रहते थे। मगर जर्जर आवास के कारण हादसे से बचाने के लिए कर्मचारियों से आवास खाली करा लिए गए हैं।
जेल प्रशासन ने सभी 102 जर्जर आवासों को डिमालिश कराने की तैयारी की है। जेल प्रशासन ने लोक निर्माण विभाग खंड एक के अधिशासी अभियंता को जर्जर आवासों को मुआयना कराकर निष्प्रयोज्य प्रमाण पत्र व मूल्यांकन रिपोर्ट मांगी है। इसके बाद लोक निर्माण विभाग की रिपोर्ट को जेल प्रशासन अनुमति के लिए जेल मुख्यालय भेजेगा। जहां से अनुमति मिलते ही सभी 102 आवासों को डिमालिश करा दिया जाएगा।
जिला कारागार में बंदियों के लिए 13 बैरकें बनी हैं। इसके अलावा एक महिला बैरक और एक अस्पताल बैरक भी बनी है। जेल में एंट्री के दिन बंदी को इसी अस्पताल बैरक में रखा जाता है। इसके बाद दूूसरे दिन उसे दूसरी बैरक में शिफ्ट कर दिया जाता है। इन 15 बैरकों के अलावा तीन बैरके जर्जर हो चुकी हैं। जेल प्रशासन ने जर्जर इन बैरकों का भी एस्टीमेट मांगा है। इसके बाद इन तीनों बैरकों को भी डिमालिस किया जाएगा।
जेल अधीक्षक शशिकांत सिंह यादव ने बताया कि ब्रिटिश सरकार के समय में वर्ष 1919 में जेल परिसर में कर्मचारियों के लिए बनाए गए 102 आवास जर्जर हो गए हैं। ऐसे आवासों को ढहाने के लिए लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता से आवासों का मुआयना करके निष्प्रयोज्य प्रमाणपत्र देने के साथ ही मूल्यांकन रिपोर्ट मांगी गई है। लोक निर्माण विभाग के निष्प्रयोज्य प्रमाणपत्र व मूल्यांकन रिपोर्ट देने के बाद उसे मुख्यालय भेजा जाएगा। वहां से अनुमति मिलते ही सभी आवासों को डिमालिश करा दिया जाएगा।