सड़क घटिया बनने पर चेयरमैन ने दे दिया था इस्तीफा
गोंडा। वर्तमान में जहां विकास कार्यों में अक्सर मानकों की अनदेखी कर दी जाती है और तमाम आरोप-प्रत्यारोप भी लगते रहते हैं लेकिन लोग सत्ता में बैठे लोग उसे सुनने के बजाए अनदेखा करते हुए कुर्सी से चिपके रहते हैं।
मगर नगर पालिका ने वह दौर भी देखा है जब मोहल्ले में एक सड़क का घटिया निर्माण हुआ तो तत्कालीन चेयरमैन त्रिलोकीनाथ मेहरोत्रा ने इस्तीफे दे दिया था। चेयरमैन की जिद के आगे जिला प्रशासन को झुकना पड़ा और पूरी सड़क ठेकेदार को दोबारा बनवानी पड़ी।
उसके बाद जितनी भी सड़कें बनीं, वे गुणवत्ता में इतनी मजबूत थी कि जिसका लोहा आज भी लोग मानते हैं। गोंडा से विधायक रहे लाल बिहारी टंडन के दामाद और पूर्व चेयरमैन त्रिलोकीनाथ के बहनोई पारसनाथ मेहरोत्रा ने दो प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि किस तरह गोंडा को विकास में आगे ले जाने व उसकी गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने के लिए तत्कालीन चेयरमैन को अपनों का विरोध झेलना पड़ा जो अंत में जिले की तहजीब व विकास के लिए मिसाल बन गई।
घटना 1966 से 71 के कार्यकाल की है जब अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियां तोड़ चुके जिले में विकास की नई कोपलें खिलने को आतुर थीं लेकिन भ्रष्टाचार रूपी दीमक भी विकास के पौध को कुतरने की कोशिश कर रही थी। नगर की गलियों व मोहल्ले को सड़कों से जोड़ने के लिए जाल बिछा रहा था। सड़कों की गुणवत्ता खराब न हो इसलिए तत्कालीन चेयरमैन त्रिलोकीनाथ खुद अपने सामने निर्माण सामग्री तैयार कराकर निर्माण करा रहे थे। इस बीच बरेली में रहने वाली उनकी बहन का निधन हो गया। इसकी सूचना पाते ही तत्कालीन चेयरमैन को वहां जाना पड़ा। जब वह लौटकर आए तो सड़क बन चुकी थी। सड़क का लोकार्पण कर दिया गया लेकिन सप्ताह भर बाद ही सड़क चटक गई थी। इसकी शिकायत तत्कालीन मोहल्लेवासियों व सभासद से की लेकिन ठेकेदार काफी प्रभावशाली थी जिसने जिला प्रशासन पर भी दबाव बना रखा था। चेयरमैन ने सड़क का पुनर्निर्माण कराने की मांग की तो मना कर दिया गया। इससे आहत चेयरमैन त्रिलोकीनाथ ने इस्तीफे दे दिया था। सारे सभासद चेयरमैन के साथ खड़े हो गए। अंतत: जिला प्रशासन को झुकना पड़ा और सड़क का पुनर्निर्माण कराया गया। इसके बाद नगर जो भी विकास कार्य हुए, उनके गुणवत्ता की मिसाल आज भी दी जाती है।
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...जब रात में कंबल ओढ़कर किसान बन गए चेयरमैन
-चुंगी चोरी रोकने के लिए बैलगाड़ी लेकर पहुंचे
गोंडा। यह घटना उस दौर की जब नगर पालिका की आय का प्रमुख जरिया चुंगी थी जो माल लादकर आने वाली बैलगाड़ियों से शुल्क के रूप में वसूला जाता था लेकिन इसमें भी भ्रष्टाचार की जड़ों ने पैठ बनानी शुरू कर दी थी। मामले की शिकायत तत्कालीन चेयरमैन त्रिलोकीनाथ तक पहुंची तो वह कंबल ओढ़कर एक किसान के साथ बैलगाड़ी पर सवार हो गए। गाड़ी जब चुंगी वसूलने के लिए लगे नगर पालिका के कर्मचारी के पास पहुंची तो उसने चुंगी तो ले ली लेकिन रसीद नहीं काटी। दूसरे दिन नगर पालिका के सदन में चेयरमैन ने सभी सभासदों को इसकी जानकारी दी तो चुंगी लेने वाले कर्मचारी से पूछा गया तो वह मुकर गया लेकिन जब चेयरमैन ने बताया कि कंबल ओढ़े वह किसान कोई और नहीं वह खुद थे, तो उसके हाथ-पांव फूल गए। भरी सदन में उसने माफी मांगी और आइंदा से ऐसा न करने की शपथ ली, तब उसे बख्शा गया।