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बाढ़ की आफत पर पहले से राहत

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बाढ़ की आफत पर पहले से राहत
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पहले बाढ़ आने पर मचती थी भीषण तबाही, अब जानमाल का नहीं होता उतना नुकसान
राजेश तिवारी
गोंडा। करनैलगंज और नवाबगंज इलाके की नियति बन चुकी बाढ़ 10 साल बीत जाने के बाद भी यहां रहने वाले लोगों का पीछा नहीं छोड़ रही। हालांकि 10 साल पहले आने वाली बाढ़ और आज आने वाली बाढ़ के मतलब काफी हद तक बदल चुके हैं। क्योंकि पहले जब इलाके में बाढ़ आती थी, तो उससे एक बड़े पैमाने पर त्रासदी मचती थी। लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे लोगों को नदी की धारा और उससे मचने वाली तबाही का ज्ञान हुआ। लोग इसके खतरे से सतर्क हो गए। यही वजह है कि आज इलाके में बाढ़ का प्रकोप तो है, लेकिन इससे प्रभावित आबादी उतनी नहीं है, जितनी की पहले हुआ करती थी। इसी पर पेश है अमर उजाला की यह खास रिपोर्ट-

जिले में घाघरा नदीं पर बने बांध की स्थिति-(एक नजर में)-
बांध का नाम लंबाई (किमी.) निर्माण वर्ष लागत व मरम्मत
परसपुर-धौरहरा बांध 60.600 1957-58 1 करोड़ रुपए
भिखारीपुर-सकरौर रिंग बांध 22.600 2006-07 43 करोड़ रुपए
एल्गिनब्रिज-चरसड़ी तटबंध 52.400 2006-07 100 करोड़ से ऊपर
जिले में बांध कटने पर क्या था जलस्तर और कितना पानी हो रहा था डिस्चार्ज-
वर्ष खतरे का निशान अधिकतम जलस्तर डिस्चार्ज पानी
वर्ष 2007 106.07 107.11 3.82 लाख क्यूसेक
अगस्त 2008 106.07 107.47 5.33 लाख क्यूसेक
अगस्त 2009 106.07 107.55 5.68 लाख क्यूसेक
अगस्त 2010 106.07 107.05 3.49 लाख क्यूसेक
जुलाई 2011 106.07 106.89 3.68 लाख क्यूसेक
अगस्त 2016 106.07 106.446 2.68 लाख क्यूसेक
जुलाई 2017 106.07 106.296 2.55 लाख क्यूसेक

अतीत के आईने मे कब-कब आई बाढ़ और नुकसान पर एक नजर-
वर्ष टूटा बांध जन/पशुहानि प्रभावित गांव/प्रभावित आबादी
01.08.07 भिखारीपुर-सकरौर 06/06 73 गांवों की 1.5 लाख आबादी
24.08.08 भिखारीपुर-सकरौर 42/00 75 गांवों की 1.6 लाख आबादी
08/09-2009 बाढ़ आने से 11/03 45 गांवों की 55 हजार आबादी
28.08.10 एल्गिनब्रिज-चरसड़ी 13/00 60 गांवों की 75 हजार आबादी
17.09.10 भिखारीपुर-सकरौर 11/00 50 गांव की 55 हजार आबादी
30.07.11 एल्गिनब्रिज-चरसड़ी 06/05 60 गांवो की 90 हजार
01.08.11 एल्गिन रिंग बांध 05/02 65 गांवों की 70 हजार आबादी
7.08.16 एल्गिन-चरसड़ी कोई नहीं 10 गांवों की 80 हजार आबादी
08.0816 एल्गिन रिंग बांध कोई नहीं 10 गांवों की 80 हजार आबादी
जुलाई 2017 पहले से ही कटा बांध अबतक नहीं 15 गांवों की सवा लाख आबादी
नोट : हालांकि 2017 में आई बाढ़ को लेकर प्रशासन के मुताबिक बाढ़ से इलाके मे 8 गांव और उनके 35 मजरे ही अबतक प्रभावित हुए हैं।

इनसेट
पानी मेें डूबकर मरे से 24 ग्रामीण
बीते 10 वर्षों में जब-जब एल्गिन-चरसड़ी बांध नदी के पानी के दबाव में टूटा है, तब-तब इसके पानी के होने वाले फैलाव ने जमकर तांडव मचाया। वर्ष 2010 में जब नदी का जलस्तर खतरे के निशान से एक मीटर 5 सेमी ऊपर गया था तो उस वक्त बंधे पर बने दबाव से जिस समय बंधा टूटा, उस समय जितने भी पेड़ नदी की धारा के सामने आए, उन सबको नदी का पानी बहा ले गया। साल 2010 में एक नहीं बल्कि दो-दो बंधे टूटे थे, जिसमें एल्गिन-चरसड़ी के साथ भिखारीपुर-सकरौर बांध भी था। जिसके पानी में डूबकर 24 लोग मारे गए थे, जबकि दर्जनों की संख्या में मवेशी तक लापता हो गए थे। वहीं घाघरा नदी के पानी का अधिकतम डिस्चार्ज वर्ष 2009 में 5.68 लाख क्यूसेक रहा। जो मौजूदा समय घाघरा में डिस्चार्ज पानी का दूना था।
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...इसलिए बांध का विरोध कर रहे लोग
करनैलगंज के मांझा इलाके में रहने वाले लोग पिछले पांच साल से बांध बनाए जाने का विरोध कर रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण उनकी खेती से तो जुड़ा ही है, साथ में उन्हें नदी की धारा को मोड़ने के लिए बनाए जाने वाले बंधे में भी कोई खास रुचि नहीं है। क्योंकि एल्गिन-चरसड़ी बांध बनने के बाद उनकी काफी जमीन घाघरा में चली गई थी और जो बची-खुची जमीन रह गई है, उसे वह छोड़ना नहीं चाहते। बीते महीने प्रभारी मंत्री के बंधा निरीक्षण के दौरान करनैलगंज के लोगों ने बांध बनाने का विरोध किया था और मंत्री से साफ-साफ दो टूक शब्दों में बता दिया था कि वह लोग किसी भी सूरत में नया बांध बनाने के पक्ष में नहीं है।
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10 साल पहले से बेहतर हैं हालात
जिले में बाढ़ की आपदा से जूझते-जूझते करनैलगंज के लोगों को 15 दिन बीत चुके हैं। 15 दिनों से करनैलगंज के 80 से ऊपर मजरों में बाढ़ का पानी भरा हुआ है। जिसके कारण मजबूरी में उन्हें घर-बार छोड़क़र बंधे पर शरण लेकर रहना पड़ रहा है। जिनके लिए प्रशासन की ओर रहने-खाने, दवाई-इलाज तक की व्यवस्थाएं की गई हैं। वहीं अगर बाढ़ के 10 साल पुराने हालातों पर नजर डालें तो उस वक्त बाढ़ से पैदा हुई स्थितियों और आज में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। पहले घाघरा नदी से जो तबाही मचती थी, उसके आगे प्रशासन तक बौना नजर आता था।
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समय के साथ घाघरा ने बदली दिशा
30 साल पहले तक करनैलगंज इलाके में घाघरा नदी जहां दक्षिण दिशा की ओर बहा करती थी। वहीं मौजूदा वक्त नदी की एक धारा उत्तर दिशा की ओर बहने लगी है। यकीन नहीं होता तो 10 साल के अंतराल पर एल्गिन-चरसड़ी बांध के उस कटे हुए हिस्से को ही देख लिया जाए। जिसे घाघरा नदी ने पांच बार अपना निशाना बनाया और पांचों बार यह बंधा सिर्फ एक किलोमीटर के दायरे में ही धराशाई हो गया। गौरासिंहनापुर से बेंहटा के बीच परसावल के पास नदी की एक धारा उत्तरदिशा की ओर बहने लगी है, जिसने न सिर्फ एल्गिन-चरसड़ी बांध को काटा, बल्कि उसके ठीक पीछे बने रिंग बांध को भी धराशाई कर डाला। जिससे घाघरा नदी का पानी बीते 10 दिनों से करनैलगंज इलाके में भर रहा है।
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एक गांव का मिटा वजूद तो कई गांवों पर संकट
परसपुर के एक गांव चंदापुर किटौली का वजूद घाघरा नदी खत्म कर चुकी है। इस गांव में एक समय एक दर्जन के करीब छोटे-बड़े पुरवा व मजरे हुआ करते थे। जहां से होकर आज घाघरा नदी का पानी बह रहा है। चूंकि घाघरा नदी से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र करनैलगंज का है, इसलिए यहां नदी के किनारे-किनारे बने दर्जनभर गांव घाघरा नदी के निशाने पर हैं। जिसमें से मौजूदा वक्त कई गांव और उनके मजरे डूबे हुए भी हैं। लेकिन नदी के बढने की रफ्तार काफी कम होने के कारण, अभी उस तेजी से पानी का फैलाव गांवों में नहीं हो रहा, जितना कि बीते वर्षों में हुआ करता था। इसलिए कुछ राहत है। लेकिन जानकारों की माने तो अगर कहीं जलस्तर में तेजी से बढ़ोत्तरी होती है, तो इससे वह गांव भी चपेट में आ जाएंगे। जहां पिछले कई वर्षों से बाढ़ के पानी की एक बूंद नहीं पहुंची थी।
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