गहमर गांव में आयोजित अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन में परिचर्चा करते साहित्यकार दानिश।
गांव स्थित एक पैलेस में शनिवार को दो दिनी अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इसमें साहित्यकारों ने हिंदी के विकास पर जोर देते हुए कहा कि हिंदी साहित्य समाज का संक्रमण रोकता है। हिंदी में तहजीब है, तमीज है। हिंदी भाषी होने पर हमें गर्व करना चाहिए। इस दौरान पुस्तक ‘अब तो’ का लोकार्पण किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ. अनुपमा सिंह ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके बाद छात्राओं ने साहित्यकारों का स्वागत किया।
प्रथम सत्र में कवियों को बैज एवं अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ‘शर्म नहीं स्वाभिमान है हिंदी’ विषय पर परिचर्चा हुई। इसमें राजस्थान से आईं डॉ. आशा ने कहा कि हिंदी साहित्य समाज का संक्रमण रोकता है। देश के एक राज्य का आदमी दूसरे राज्य की भाषा को नहीं समझ सकता, लेकिन हिंदी हर राज्य का आदमी आसानी से समझ लेता है। हमें इसके विकास के लिए प्रयत्न करना चाहिए। गर्व होना चाहिए कि हम हिंदी भाषी हैं। हिंदी में तहजीब है, तमीज है और इसका व्याकरण सरल है। कहा कि एक राष्ट्र, एक भाषा और एक कानून की आवश्यकता है।
मध्य प्रदेश के सीधी से आए डॉ. रामगरीब विकल का कहना था कि मां की गोद में बच्चा जो सीखता है, वही मातृभाषा है। पश्चिमी देशों की संस्कृति भौतिकवादी है और हमारी अध्यात्मवादी है। परिचर्चा में डॉ. देवनारायण शर्मा, चंद्रावती नागेश्वर, संजीव निगम, डॉ. संदीप अवस्थी, सुरेश जशाला, हरी जोशी, अशोक व्यग्र, जंगबहादुर पांडेय ने भी विचार रखे। संचालन मिथिलेश गहमरी, अध्यक्षता रांची विश्वविद्यालय (झारखंड) के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंगबहादुर पांडेय ने की। आयोजक अखंड प्रताप सिंह ने आभार व्यक्त किया।