कुदरत के कहर से किसानों की कमर पूरी तरह से टूट गई है। बेमौसम बारिश और ओलों के पड़ने से चौपट हुई फसल का जो हिस्सा बच भी गया था, उसे अब आंधी-पानी बर्बाद कर रहा है।
बारिश के चलते अब सब्जी के साथ ककड़ी, खीरा, तरबूज की फसल पर भी खतरा मंडराने लगा है, जबकि बारिश और ओलों के पड़ने से गेहूं के साथ दलहनी और तिलहनी फसल पहले ही नष्ट हो चुकी थी।
ऐसे में किसानों का पैसा ही नहीं पसीना भी बर्बाद हो गया है, लेकिन मदद के नाम पर अभी तक शासन -प्रशासन से प्रभावित किसानों को फूटी कौड़ी तक नहीं दी गई है।
शेरपुर कला गांव के किसान रामदीन का दर्द सुनकर दिल दहल उठता है। अपने फसलों की बर्बादी बया करते हुए वह कहते हैं कि ढाई बीघे भूमि में गेहूं बोया था।
सोचा था इस फसल से घर में साल भर के लिए रोटी का इंतजाम हो जाएगा। बड़ी मेहनत के बाद फसल पक कर तैयार तो हुई लेकिन कटाई का समय आया तो बारिश के बीच हवा के झोंके से फसल लोट गई।
घर में बमुश्किल तीन से चार कुंतल गेहूं आया है। गेहूं के दाने कमजोर और काले पड़ गए हैं। शेष फसल खेत में ही बर्बाद हो गई। साल भर रोटी कैसे नसीब होगी, समझ में नहीं आ रहा है।
करंडा के किसान राम दरश का भी दर्द कम नहीं है। वह कहते हैं गेहूं तो बचा नहीं है। दलहन और तिलहन की भी खेती बर्बाद हो गई है। आगे घर में चूल्हा कैसे जलेगा, समझ में नहीं आ रहा है।
जमानिया के किसान रामदीन भी फसल बर्बाद होने से परेशान हैं। कहते हैं कि अब कुछ भी नहीं बचा है। दूध बेंचकर ऊपरी खर्च चलाता हूं, लेकिन आगे जानवरों को भूसा कैसे मिल पाएगा, यह सोच कर अभी से ही चिंता बढ़ गई है।
धरम्मरपुर के किसान जगराम पाल ने गंगा किनारे ककड़ी, तरबूज और खीरे की खेती की है। उनका कहना है कि बारिश में तमाम पौधे गल गए। फूल झड़ने से पैदावार भी प्रभावित हुई।
फसल में रोग का प्रकोप भी हो गया है लेकिन सरकारी मदद के नाम पर अभी तक फूटी कौड़ी नहीं मिली है। करीमुद्दीनपुर के पाहूपुर गांव के किसान ब्रह्मा गिरि, पंचमी राम, मोहन की भी गेहूं की फसल नष्ट हो गई है।
मड़ाई के बाद नाममात्र का गेहूं घर आ सका है, जबकि बीते मंगलवार को आई आंधी में जहां अधिकांश भूसा उड़ गया। वहींभूसा बारिश में भीग गया है।