तपिश बढ़ने के साथ ही जिले में भूजलस्तर के खिसकने भी तेजी आ गई है। जिले में भूजलस्तर काफी कम हुआ है। अगर ऐसा ही रहा तो लोगों को प्यास बुझानी मुश्किल हो जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित यह है कि नलकूप चलने पर क्षेत्र के हैंडपंप पानी देना बंद कर दे रहे। सहायक छोटी नदियां सूखने लगी हैं।
वहीं जिले में जलसंरक्षण के प्रति कुछ भी नहीं किया जा रहा है। गंगा, गोमती, बेसो, मंगई, टौंस आदि नदियों से घिरे जनपद में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। गंगा सिमटने लगी हैं और छोटी सहायक नदियों में पानी बेहद कम हो गया है।
इधर दो दिनों से तापमान 38 से 39.5 डिग्री सेल्सियस चल रहा है। अगर यही स्थिति रही तो कई सहायक नदियां सूख जाएंगी। जबकि गांवों में अधिकतर तालाब, पोखरों पर अतिक्रमण है। कुएं पाट दिए गए हैं। मनरेगा के तहत खोदे गए तालाबों में पानी नहीं भरा जा रहा है।
ऐसे में पानी की किल्लत होना लाजिमी है। जल दिवस पर जल संरक्षण की कवायद तो होती है लेकिन भूजल संरक्षण की दिशा में मानकों का पालन नहीं कराया जाता। नतीजतन भूजल स्तर गिरता जा रहा है।
जल निगम के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले के सदर, सैदपुर, करंडा, बिरनो, जंगीपुर, मरदह, दिलदारनगर में छह से लेकर दस मीटर तक भूजल स्तर गिरा है। जंगीपुर और बिरनो में नलकूप चलाया जाता है तो गांव के हैंडपंपों से पानी आना बंद हो जाता है।
जलनिगम की ओर से गहमर, जमानिया, सैदपुर क्षेत्र में 200 फीट बोरिंग करने का मानक है जबकि कहीं-कहीं इससे अधिक भी बोरिंग कराई जा रही है। जानकारी के अनुसार, जिले में 250 अधिक हैंडपंप खराब पड़े हैं। ऐसे में प्रश्ाासन के लापरवाह रहने से पानी मिलने की बात कैसे की जा सकती है।