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Ghazipur News: जिन सपूतों ने देश के लिए दे दी जान, उनके गांवों को न बलिदानी गांव का दर्जा मिला न ठीक सड़क

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कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन
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गाजीपुर। कारगिल विजय दिवस हर साल देश को उन वीरों की याद दिलाता है जिन्होंने तिरंगे की शान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। गाजीपुर ने भी कारगिल युद्ध में छह वीर सपूत खोए, लेकिन उनके बलिदान के 27 साल बाद भी कई गांव विकास और सम्मान की बुनियादी सुविधाओं के लिए इंतजार कर रहे हैं। कहीं बलिदानी के गांव का प्राथमिक विद्यालय बरसात में गंदे पानी से घिर जाता है, कहीं बलिदान द्वार से गांव तक की सड़क जर्जर पड़ी है तो कहीं गांव को बलिदान ग्राम घोषित करने का वादा अब तक पूरा नहीं हो सका।
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15 जून 1999 को बाघी के नायक शेषनाथ यादव और भैरोपुर के कमलेश सिंह ने सर्वोच्च बलिदान दिया। तीन जुलाई को फखनपुरा के ग्रेनेडियर इश्तियाक खां, 20 अगस्त को पंडितपुरा के जयप्रकाश यादव, 21 अगस्त को पड़ैनिया के रामदुलार यादव और एक सितंबर को धनईपुर के संजय सिंह यादव मातृभूमि पर न्योछावर हो गए। इन छह बलिदानियों ने कारगिल की जीत की इबारत लिखने में अपना अमूल्य योगदान दिया।
इनकी कहानियां सिर्फ युद्धभूमि की बहादुरी तक सीमित नहीं हैं। इश्तियाक खां शादी की छुट्टी पर घर आए थे, लेकिन जंग छिड़ते ही दुल्हन को छोड़ मोर्चे पर लौट गए। बटालिक सेक्टर में उन्होंने दुश्मन तक पहुंचने के लिए रस्सी के सहारे सीधी पहाड़ी चढ़ने का सुझाव दिया और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बड़े भाई भी उसी ऑपरेशन में घायल हुए थे।
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जयप्रकाश यादव भी विवाह के कुछ ही दिनों बाद सीमा पर लौटे और फिर कभी घर नहीं आ सके। शेषनाथ यादव की पत्नी सरोज आज भी उनकी प्रतिमा की देखभाल करती हैं और हर वर्ष पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करती हैं। रामदुलार यादव के बेटे आज भी पिता के सपनों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि संजय यादव के परिवार को पेट्रोल पंप तो मिला, लेकिन गांव की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हैं।
भैरोपुर के लोगों का कहना है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद गांव को आज तक बलिदानी ग्राम का दर्जा नहीं मिला। वहीं धनईपुर के प्राथमिक विद्यालय के सामने जलनिकासी नहीं होने से बरसात में बच्चों को गंदे पानी से होकर स्कूल जाना पड़ता है। बलिदानों की प्रतिमाओं पर हर साल माल्यार्पण होता है, लेकिन उनके गांव आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं।
कारगिल विजय दिवस पर जब पूरा देश इन वीरों को सलाम करता है, तब गाजीपुर के ये गांव एक सवाल भी पूछते हैं, क्या बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्पांजलि से पूरी हो जाएगी या उनके सपनों के गांव भी कभी सम्मान और विकास की पहचान बनेंगे?

देश के लिए जान देने वाले सैनिक के नाम पर गांव में कम से कम एक सड़क या प्रवेश द्वार तो होना ही चाहिए। कई बार उप जिलाधिकारी और जिलाधिकारी को पत्रक दिया, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।-अजय सिंह यादव, बलिदानी संजय सिंह यादव के छोटे भाई।

बलिदानी कमलेश सिंह के गांव तक जाने वाली सड़क जगह-जगह से टूटी हुई है। उनके घर से महज 100 मीटर दूर उच्च प्राथमिक विद्यालय तक बच्चों को पगडंडी से जाना पड़ता है। स्कूल परिसर में साफ-सफाई नहीं है और बड़ी-बड़ी घास उगी है, इससे बच्चे भी आने-जाने से कतराते हैं।- योगेश सिंह, बलिदान कमलेश सिंह के भतीजे।

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

कारगिल युद्ध के बलिदानी----जयप्रकाश यादव। स्रोत- परिजन

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