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Ghazipur News: पर्चा एक रुपये का पर इलाज का खर्च एक हजार

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शहर के गोराबाजार स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दवा की काउंटर पर लिए लगी मरीज व तीमारदारों की भ
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गाजीपुर। महर्षि विश्वामित्र स्वायत्तशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय के अस्पताल में इलाज अब मरीजों के लिए राहत नहीं मुसीबत बन गया है। एक रुपये का सरकारी पर्चा तो मिल जाता है, लेकिन इलाज करवाने के लिए आए मरीजों की जेब से रोज 500 से 1000 रुपये तक खर्च हो रहे हैं।
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सरकारी पर्चे पर ही डॉक्टर बाहर की महंगी दवाएं लिख रहे हैं। पैथोलॉजी जांच के नाम पर भी यही खेल जारी है। मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती मरीजों को भी रोज छोटी पर्चियों पर बाहरी दवाएं लिख दी जाती हैं। ऐसे में अस्पताल प्रबंधन की निगरानी और सस्ते इलाज के वादे पर सवाल उठ रहे हैं। जबकि सरकार हर साल मेडिकल कॉलेज अस्पताल को करोड़ों रुपये का बजट देती है। ड्रग कॉरपोरेशन के जरिये दवाएं मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती हैं। जन औषधि केंद्र भी खोले गए हैं ताकि मरीजों को सस्ती दवाएं मिल सकें, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन व्यवस्थाओं का फायदा मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा। डॉक्टरों की मनमानी और सिस्टम की खामियों ने गरीब मरीजों पर बोझ बढ़ा दिया है। सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज का वादा अब सिर्फ कागजों पर रह गया है।
इस तरीके से होता है खेल -मेडिकल कॉलेज अस्पताल के विभिन्न विभागों की ओपीडी में जो मरीज आते हैं, उनके पर्चे पर चिकित्सक औसतन पांच से छह दवाएं लिखते हैं। इनमें जो दवा अस्पताल में मिलनी होती है उस पर सही का निशान लगा देते है और जो जनऔषधी केंद्र की दवा होती है, उसे काले रंग से घेर दिया जाता है। जबकि बाहर की दवाओं पर गोल घेरा बनाया जाता है, जिसे देखते ही मेडिकल स्टोर वाले पहचान लेते है।
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बाहर की दवाएं लिखने पर पूरी तरह प्रतिबंध है। अस्पताल में सभी दवाएं उपलब्ध हैं। कोई दवा नहीं होती है तो उसकी खरीदारी जाती है। अगर ऐसा कुछ है तो जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। -प्रो.आनंद मिश्रा, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज, गाजीपुर।
पत्नी को लेकर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के यूरोलॉजी विभाग की ओपीडी में आए थे। चिकित्सकों ने पांच दवाएं लिखीं। इनमें केवल एक दवा अस्पताल में मिली शेष चार दवाओं को बाहर से खरीदना पड़ा। इस पर करीब 1350 रुपये का खर्च आया। -अमित कुमार राय, जमानिया
पत्नी को दिखाने के लिए मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में आए थे। चिकित्सक ने पांच दवाएं पर्ची पर लिखीं। इसमें एक दवा अस्पताल से मिली और एक दवा जनऔषधी केंद्र पर, जबकि बाकी तीन दवाएं बाहर से लेनी पड़ीं। इस पर 870 रुपये का व्यय आया। -रमेश सिंह, सुरतापुरगांव,
मोहम्मदाबाद
मेडिकल कॉलेज अस्पताल के सर्जरी विभाग की ओपीडी में आए थे। चिकित्सक ने पांच दवाएं लिखी। एक दवा तो अस्पताल में मिल गई जबकि चार दवाएं बाहर से लेनी पड़ीं। इस पर 570 रुपये खर्च हुए। -राधेश्याम राजभर, अमहर, कासिमाबाद
पेट की बीमारी से ग्रसित है। इलाज कराने के लिए मेडिसीन विभाग की ओपीडी में गए थे, जहां चिकित्सक ने छह दवाएं लिखी। जिसमें से दो दवा अस्पताल के अंदर मिली, जबकि शेष चार दवाएं बाहर से लेनी पड़ी। जिस पर 985 रुपये का खर्च आया। -जयराम, केरारी, कासिमाबाद
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