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मूर्तियों में जान डालने वाले हुनमंदों के चेहरे पर बेबसी

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मरदह। नवरात्र पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप देने में कलाकार जुट गए हैं। कोई पुश्तैनी धंधे को बचाने में महंगाई से जूझ रहा है, तो कोई आत्म संतुष्टि के लिए अपनी कला का जौहर दिखा रहे हैं। पीपनार गांव निवासी दो सगे भाइयों सुनील राजभर एवं सोनू राजभर एक माह से प्रतिमा तैयार करने में जुटे हैं। यह कलाकार भी मंहगाई की मार झेल रहे हैं। कड़ी मेहनत के बावजूद मनमाफिक रकम मिलने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। कुछ कलाकार ऐसे हैं, जो पुश्तैनी धंधे को बचाने में जुटे हैं। पसीने से तर-बतर हाथों में पेटिंग ब्रश लिए दुर्गा प्रतिमा को अंतिम रूप दे रहे हैं। अमर उजाला की टीम से बातचीत में सुनील राजभर ने बताया कि उनके यहां करीब एक दर्जन प्रतिमाएं तैयार की जा रही है। हम दोनों भाई पढ़ाई लिखाई के साथ ही परिवार के जीविकोपार्जन के लिए घर पर ही अपनी कला को उकेरने में लगे हैं। मगर जिस तरह अभी तक आर्डर आ रहे हैं, उसको देख ऐसा प्रतीत हो रहा है कुछ प्रतिमाएं बच भी जाएंगी। कहा, क्या करें धंधा है और अब कुछ कर भी नहीं सकते। इसलिए इसी काम में लगे रहना मजबूरी भी है। मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाली बांस, लकड़ी, सुतरी, मिट्टी, पेंट, कपड़ा आदि का मूल्य एक वर्ष में दोगुने हो गए हैं, जबकि मूर्तियों के दाम वहीं है।
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