गाजीपुर। कासिमाबाद के चौरा में पहला बॉयोफलॉक पॉन्ड बन गया है। इसके निर्माण में 14 लाख रुपये खर्च आया है। जिसमें 40 प्रतिशत सब्सिडी दी गई है। आठ बिस्वे में बॉयोफलॉक पॉन्ड निर्माण किया गया है। बॉयोफलॉक पॉन्ड में कैट फिश प्रजाति की मछलियों का संवर्धन और पालन होता है। इसकी क्षमता 25 हजार मत्स्य बीज उत्पादन की है। एक महीने के अंदर बॉयोफलॉक पॉन्ड तैयार किया गया है। उम्मीद है कि एक-दो महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका ऑनलाइन उद्घाटन करेंगे। वित्तीय वर्ष 2022-2023 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत आवेदन किया गया था। जिसके बाद ई-लॉटरी सिस्टम के जरिए आवेदक का चुनाव किया गया।
क्या है बॉयोफलॉक पांड बॉयोफलॉड पॉन्ड मछली पालन की एक नवीनतम तकनीक है। इसके जरिये टैंकनुमा संरचना में मछलियों का पालन किया जाता है। इसमें बॉयोफलॉक नामक बैक्टीरिया छोड़ी जाती है। मछलियाें को जब भोजन दिया जाता है तो वह लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक मल के रूप में उत्सर्जित करती हैं। बॉयोफलॉक बैक्टीरिया मल को प्रोटीन में बदलने का कार्य करती है। इसके बाद मछलिया प्रोटीन को ग्रहण कर लेती हैं। इससे मछलियों का विकास काफी तेजी से होता है। इस पद्धति में गंदगी काफी कम फैलती है। इसके कारण पानी को प्रतिदिन बदलने की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।
18 से 20 लाख तक की कमाई बॉयोफलॉक पद्धति से मत्स्य पालन में किसान और मत्स्य पालकों को वार्षिक 18 से 20 लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है। ऐसे में यह पद्धति काफी मुनाफे का सौदा है। इस पद्धति से मत्स्य पालन करने में मछलियां जल्दी बीमार नहीं पड़ती हैं। इसके कारण मछलियों के मरने का जोखिम न के बराबर होता है।
पद्धति से मत्स्य पालन को मिलेगा बढ़ावा बॉयोफलॉक पद्धति का प्रयोग मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। यदि व्यापक स्तर पर मत्स्य पालन बॉयोफलॉक पद्धति से होने लगेगा तो नीली क्रांति के अभियान को तेजी मिलेगी।
कासिमाबाद के चौरा में बॉयोफलॉक पांड बनकर तैयार हो चुका है। इसकी क्षमता 25,000 हजार मत्स्य बीज की है।- सपना पुरी, सीईओ, मत्स्य विभाग