कासिमाबाद। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरजू पांडेय के नेतृत्व में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने 15 अगस्त 1942 को कासिमाबाद थाने पर धावा बोलकर थाने को आग के हवाले कर दिया। कब्जा करके थाने पर तिरंगा फहरा दिया। उनके आंदोलन से अंग्रेजी हुकूमत घुटने पर आ गई। उनके इस आंदोलन की धमक गाजीपुर सहित पूरे पूर्वांचल में सुनी गई। इस आंदोलन से सरजू पांडेय अंग्रेजों के निशाने पर आ गए। उनके पैतृक गांव उरहां जगदीशपुर में कुुर्की जब्ती की कार्रवाई भी हुई। उनके भतीजे राम नारायण पांडेय (95) बताते हैं कि उस समय मिट्टी के घर पर अंग्रेजों ने घोड़ा दौड़ा दिया। बड़े भाई रामलाल के शरीर से शॉल छीन ले गए। पता बताने के लिए उनके पिता महावीर पांडेय को भी अंग्रेजों ने अपमानित और प्रताड़ित किया। थाने में आगजनी और हथियारों की लूट घटना के बाद आंदोलनकारियों पर भारत सुरक्षा अधिनियम की धारा 35 और भारतीय दंड विधान की धारा 395 और 436 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। मुकदमे में सरजू पांडेय सहित 16 लोगों को विभिन्न धाराओं में सजा हुई। कोर्ट में सरजू पांडेय ही एकमात्र ऐसे अभियुक्त थे, जिन्होंने सीना चौड़ा करते हुए थाना फूंकने में अपनी भूमिका को स्वीकार किया था, लेकिन लूटपाट से इन्कार किया था। सरजू पांडेय की साफगोई से जज भी प्रभावित हुआ था। (संवाद)