फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेमतलब साबित हो रहा गन्ना अनुसंधान केंद्र

विज्ञापन
विज्ञापन
औड़िहार। जिले में गन्ने की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 40 हेक्टेयर में गन्ना शोध एवं बीज संवर्धन केंद्र की स्थापना बेमतलब साबित हो रही है। करोड़ों की लागत से1987 में प्रदेश के तत्कालीन गन्ना आबकारी एवं परिवहन मंत्री रामनाथ मुंशी ने सादात क्षेत्र के कटया गांव में केंद्र की स्थापना कराई थी। उस दौरान यहां चार पंपिंग सेट एवं सिंचाई के अन्य उपकरण के अलावा प्रशासनिक भवन, कार्यालय, कर्मचारियों के लिए सुविधा युक्त आवास एवं अन्य संसाधन उपलब्ध कराए गए। केंद्र का उद्देश्य था कि जनपद और पड़ोसी जिलों में गन्ने की विकसित प्रजातियां तैयार कराकर रकबा बढ़ाया जाए। इसके स्थापना के समय यहां बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी और यहां के गन्ना किसान अपना गन्ना बेच कर खुशहाल भी थे। लेकिन 90 के दशक आते-आते नंदगंज चीनी मिल बंद कर दी गई। तब से गन्ने का क्षेत्रफल यहां घट गया। स्थानीय किसानों का कहना है कि यदि राज्य सरकार चीनी मिलों के संचालन में रुचि ले तो किसानों को गन्ने की खेती से अच्छा लाभ मिल सकता है। इसके साथ ही लंबे क्षेत्र में फैले इस अनुसंधान केंद्र की उपयोगिता भी और कारगर हो सकती है। वहीं, केंद्र की ओर से आज कल धान की खेती के उन्नत बीज भी तैयार किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिक एवं अनुसंधान केंद्र प्रभारी डा. सरनाम सिंह ने बताया कि गन्ने की विकसित प्रजाति को तैयार करने और उस पर शोध करने में करीब 12 साल का समय लग जाता है। इस लंबे वक्त के लिए निरंतर प्रक्रिया जारी रहती है। गन्ना शोधन के सबसे बड़े केंद्र कोयंबटूर में यहां की प्रजाति को महीनों तक ले जाकर उसके जर्मिनेशन की प्रक्रिया को अपनाई जाती है। फिर से यह प्रक्रिया निरंतर सालों साल तक चलती रहती है, तब जाकर इसकी विकसित और उन्नतशील प्रजाति सामने आती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें