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मुहम्मदाबाद के शहीद पार्क देखा लोकतंत्र का इतिहास

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मुहम्मदाबाद। मैं अगस्त क्रांति का गवाह हूं। स्वतंत्रता संग्राम के अष्ट शहीदों के बलिदान का ही गवाह नहीं हूं। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र के पहरुए यहां अक्सर अलख जगाने आते रहे हैं और इतिहास की धारा को नई दिशा देते रहे हैं। स्मृतियों में वर्ष 1967, वर्ष 1974 और 1980 की घटनाएं आज भी ताजा हैं।
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18 अगस्त 1942 को शेरपुर गांव के सैकड़ों युवकों ने ब्रितानी हुकूमत के झंडे उखाड़ने के लिए तहसील पर धावा बोल दिया था। आठ नौजवानों ने प्राणों की आहूति देकर तिरंगा लहराया। सैकड़ों लोग घायल हुए। उनके बलिदान ने मुझे एक खुली जगह से मैदान में तब्दील कर दिया। चारों तरफ चहारदीवारी बनी। गेट लगा था। शहीदों का स्मारक बना। विधानसभा या लोकसभा का चुनाव आए तो नेता यहां आते जरूर हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई प्रत्याशी मकसूदन के लिए प्रचार करने आए थे। वे तय समय पर मैदान में आ गए। वे समय के बेहद पाबंद थे। सिर्फ एक चौकी रखी थी। जब वे पहुंचे आठ-दस लोग ही मौजूद थे। उन्होंने बीस मिनट तक भाषण दिया तब तक काफी लोग वहां पहुंच चुके थे। लोगों ने दोबारा भाषण देने का आग्रह किया पर उन्होंने आग्रह स्वीकार नहीं किया। पूर्व सांसद सरजू पांडेय के आग्रह पर विंध्याचल नेता की दुकान से एक गिलास दूध ग्रहण किया।
भारतीय क्रांति दल का गठन करने के बाद चौधरी चरण सिंह चुनावी सभा करने आए थे। उनकी झलक पाने के लिए हजारों लोग जुट गए थे। प्रत्याशी रामजन्म राय के समर्थन में हुई सभा में उन्होंने किसानों के हित की बात कर लोगों का मन जीत लिया। उस चुनाव में सैदपुर को छोड़कर जिले की सभी सीटों पर भारतीय क्रांति दल का परचम फहराया था। वर्ष 1977 में जनता पार्टी से चुनाव हारने के बाद 1980 के चुनाव में मेरे पार्क में सभा करने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी आईं। उनको सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। उन्होंने मात्र सात मिनट के संबोधन में विजयशंकर सिंह के पक्ष में अपील किया और वे जीते भी। धीरे-धीरे मैं एक पार्क के साथ ही कई सभाओं के साथ यहां लगने वाली प्रदर्शनी और सांस्कृतिक कार्यक्रम की पहचान बन गया। वर्ष 2000 में मुझे और सजा दिया गया।
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