13वीं शताब्दी में यहां के गंगा तट का गोलाघाट व्यापारिक ठहराव का प्रमुख केंद्र था। उस समय आवागमन व व्यापार का प्रमुख मार्ग जलमार्ग था। आसपास उस समय केवल घना जंगल था। जहां चरवाहे नियमित अपने पशुओं को चराने के लिए लेकर आया करते थे। एक दिन एक चरवाहे ने जंगल में धुआं निकलते देखा तो उसने इसकी जानकारी साथियों और आसपास के लोगों को दी। लोगों ने उस स्थान की सफाई करने के साथ-साथ खुदाई करनी शुरू कर दी। इस दौरान लोगों को वहां शिवलिंग दिखाई दिया, लेकिन शिवलिंग अपने स्थान पर जमीन में नीचे की तरफ खिंसकने लगा। कहते हैं इस दौरान फावड़े की चोट उस शिवलिंग पर पड़ी तो उसमें से रक्त की धारा निकलने लगी। लोग इस घटना से डर गए और महादेव से क्षमा प्रार्थना की। बाद में उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया। मंदिर में सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई। निर्माण के पश्चात दर्शन पूजन प्रारंभ कर दिया गया। आज भी सोमेश्वर महादेव के शिवलिंग पर फावड़े के चोट का निशान साफ दिखाई देता है।