गंवई जीवन के अद्भुत चितेरे थे विवेकी राय
गां व की मिट्टी में पले-बढ़े और उसी रूप में उसे प्रस्तुत करने वाले गंवई जीवन के अद्भुत चितेरे डा. विवेकी राय के चले जाने से आज उनका गाँव सोनवानी संज्ञाशून्य-सा हो गया है। डा. विवेकी राय जैसे लोग कभी-कभी शताब्दियों में पैदा होते हैं। वैसे उनका लेखन लंबा रहा है। लेकिन उनका जाना एक शिक्षक, लेखक और अपने बीच के एक किसान का जाना है। आजीवन विवेकी राय शहरनुमा गांव में रहते हुए भी हमारे गंवई जीवन के अद्भुत फनकार थे।
डा. राय ने उपन्यास, कहानी, ललित निबंध, रेखाचित्र, कविता, व्यंग्य, संस्मरण, रिपोर्ताज, शोध, समीक्षा के क्षेत्र में समान गति से लेखन किया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में 60 से अधिक शोध प्रबंध प्रस्तुत हो चुके हैं। गंवई संस्कृति के इस महान रचनाकार का निश्छल, सहज और ग्रामीण व्यक्तित्व बड़ा सर्वमान्य रहा है। उनकी 75 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने गंवई जीवन को लेकर स्वत: स्वीकार किया है कि ‘किसानों का देश मेरा देश है’।
डा. विवेकी राय के बारे में कहा जाता है कि ‘बाहरवाला और भीतर वाला भी, जीवन से जुड़ा ओर सृजन से संतृप्त।’ यही बात उनकी पुस्तकों में भी मिलता है। डा. राय ने कहा है कि गाँव मेरे भीतर एक सजीव भावात्मक सत्ता बनकर प्रतित होता है। गाँव का भोलापन, हंसता-खेलता ओर चित आकर्षक चेहरा बचपन से हमें प्रभावित करता चला आ रहा है। गाँव से आत्मीयता के कारण मेरे सामने संदेह रूप में प्रकट होता रहा है। गांव का सुख-दुख आजीवन डा. विवेकी राय के साथ रहा है। ऋषि रचनाकार डा. विवेकी राय गांव के सहज साक्षी के रूप में अपने शब्दों के माध्यम से लोगों के बीच रहेंगे। सचमुच प्रेमचंद के बाद गांव को समझने और देखने वाला एक चितेरा चला गया।