फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जकात के मुस्तहिक हैं गरीब और मुहताज

विज्ञापन
विज्ञापन
बहरियाबाद। इस्लाम में जिस तरह नमाज पर जोर दिया गया है, उसी प्रकार हर साहिबे-निसाब (मालदार) को जकात अदा करने का भी सख्ती से हुक्म है। इस्लाम में गरीबों, मोहताज, यतीमों तथा जरूरतमंदों की समस्याओं के निदान का एक उचित और आसान उपाय जकात के रूप में निकाला गया है।
विज्ञापन

इस्लाम धर्म मानवीय मूल्यों को लेकर भी काफी संवेदनशील है। इसके पांच स्तंभों में एक जकात (दान) भी शामिल है। जकात लेने एवं देने का एक मानक निश्चित किया गया है। हर साहिबे-निसाब जो कि कम से कम साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या इतनी मालियत के व्यवसाय, अन्न या रुपयों का मालिक हो, उस पर जकात अदा करना फर्ज है। उसे अपने इस मालियत का ढाई प्रतिशत जकात के रूप में निकालना जरूरी है। इसी तरह सदक-ए-फित्र अदा करना वाजिब है। इसे ईद की नमाज अदा करने से पहले उसके हकदारों तक पहुंचा जरूरी है। जामा मस्जिद के इमाम हाफिज शहाबुद्दीन ने बताया कि सदक-ए-फित्र में प्रति व्यक्ति पौने दो किलो गेहूं या उसका मूल्य अदा करना वाजिब है। मूल्य मौजूदा समय में जो चल रहा हो उसी पर रकम तय की जाती है। आमतौर पर लोग जकात भी हर साल रमजान के मुकद्दस महीने में ही अदा करते हैं। इसमें अधिक सवाब (पुण्य) मिलता है, हालांकि जकात कभी भी दिया जा सकता है। कहा कि कुरान में अल्लाह तआला ने फरमाया है कि जकात देते समय अपने लोगों को खास तौर पर याद रखो। इसके बाद पास पड़ोस और अन्य मुहताजों पर ध्यान दो। ताकि उनकी भी परेशानियां दूर हो सके।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें