डॉ.रामअवतार यादव
सादात। भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले क्षेत्र के हुरमुजपुर गांव के क्रांतिकारी जीतन पांडेय का बलिदान और संघर्ष आज भी सरकार की उपेक्षा का शिकार है। अंग्रेजों ने पहले उन्हें फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में आजीवन कारावास और काला पानी में बदल दिया गया। देश को आजादी मिलने के बाद भी उनके सम्मान में बनवाई गई आदमकद प्रतिमा स्थापना का इंतजार कर रही है।
जीतन पांडेय के पुत्र मिश्री पांडेय ने बताया कि हुरमुजपुर निवासी जीतन पांडेय को 20 जनवरी 1943 को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था। 24 जनवरी 1943 को जिला सेशन कोर्ट ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई, लेकिन बाद में सजा बदलकर आजीवन कारावास कर दी गई और उन्हें अंडमान की जेल भेज दिया गया। इस दौरान वह आजाद हिंद फौज से भी जुड़े और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। 25 अप्रैल 1944 को उन्हें लाहौर में दोबारा गिरफ्तार किया गया। बाद में लखनऊ सेंट्रल जेल भेजा गया, जहां से 26 मई 1946 को तीन वर्ष चार महीने की कैद के बाद रिहा हुए।
मिश्री पांडेय बताते हैं कि उनके पिता महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस दोनों के विचारों से प्रभावित थे। परिवार ने उनके सम्मान में आदमकद प्रतिमा भी बनवा ली है, लेकिन स्थापना के लिए वर्षों से जिला प्रशासन के चक्कर लगाने के बावजूद अब तक कोई स्थान नहीं मिल सका। आजादी के अमृतकाल में जहां स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद किया जा रहा है, वहीं हुरमुजपुर के लोगों का कहना है कि काला पानी की सजा झेलने वाले क्रांतिकारी जीतन पांडेय को अब तक अपेक्षित सम्मान नहीं मिलना इतिहास के साथ न्याय नहीं है।
हुरमुजपुर ने आंदोलन में निभाई थी बड़ी भूमिका
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हुरमुजपुर गांव स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। गांव के सुखराम पांडेय, सखरज पांडेय, शशिनाथ पांडेय, रामराज पांडेय, लालचंद पांडेय, रामपत सिंह, जगन्नाथ सिंह, महावीर गुप्ता, रघुनाथ सिंह, हरिहर सिंह, कपिलमुनि सिंह, सकलदीप सिंह, कालका सिंह, पतिराज सिंह, खेदू सिंह यादव, चिकोतर सिंह यादव, नरोत्तम सिंह यादव और बाबूनंदन यादव सहित दर्जनों लोगों ने आजादी की लड़ाई में सक्रिय योगदान दिया था।
मेरे पास स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं आया है। अगर कोई आवेदन आता है तो उस पर विचार किया जाएगा।-अतुल कुमार, एसडीएम, जखनिया।