गांधी जयंती पर रविवार को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले क्षेत्र के वीर सपूतों, बलिदानियों और जेल की सजा काटने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम की पट्टिका का लोकार्पण पुलिस अधीक्षक रोहन पी बोत्रे करेंगे। इसका मकसद है कि स्वतंत्रता संग्राम के वीर सपूतों का नाम जिले का बच्चा-बच्चा जाने।
इस तरह की एक पट्टिका जूनियर हाईस्कूल सादात के परिसर में लगी थी लेकिन वह आंधी-तूफान में टूटकर क्षतिग्रस्त हो गई है। हालांकि इसमें कुछ ही लोगों का नाम शामिल था। इस कमी को पूरा करने के लिए स्थानीय बाजार के व्यवसायी आशुतोष प्रकाश ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नामों की पट्टिका तैयार कराकर थाना परिसर में लगवाई है।
कार्यक्रम के संयोजक प्रकाश ने बताया कि साल 1942 में गांधी जी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए क्षेत्र के क्रांतिकारियों ने 15 अगस्त 1942 को सादात के रेलवे स्टेशन, डाकघर, बीजगोदाम लूट लिया था। इस दौरान क्रांतिकारी हरवंश दूबे को पुलिस ने गोली मारी थी। इसकी खबर मिलते ही हजारों क्रांतिकारी स्टेशन पर जुट गए और पुलिस को दौड़ा लिया। पुलिस वाले वहां से भागकर थाने आए और फिर वहां से भी भाग निकले।
लेकिन थाने के दरोगा हमीदुल्ला खां व सिपाही वली अहमद मौजूद रहे। भीड़ को देखकर यह दोनों घोड़े से भागने लगे तो क्रांतिकारियों ने घेर लिया। क्रांतिकारी अलगू यादव दरोगा को घोड़े से नीचे खींचने लगे तो दरोगा ने उन्हें गोली मार दी थी और वे वहीं शहीद हो गए। इस पर गुस्साए क्रांतिकारियों ने दरोगा और सिपाही को थाना परिसर में जिंदा आग में झोंक दिया था। इस दौरान पूरे 15 दिन तक सादात थाना आजाद रहा व थाने पर तिरंगा लहराता रहा। लेकिन अब तक इन वीर सपूतों का नाम कहीं अंकित नहीं है और न ही कही चर्चा होती है।
सादात की घटना में मारे गए दोनों अंग्रेज सिपाहियों की थाना गेट पर मजार बनी हुई है। लेकिन शहीद अलगू यादव का स्मारक आज तक नहीं बन पाया है। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के अस्सी वर्ष बीतने के बाद भी किसी भी जनप्रतिनिधि या समाजसेवी ने इन सपूतों के नाम का वर्णन तो दूर कहीं नाम तक अंकित नहीं कराया। इस अवसर पर क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों और संभ्रांत नागरिकों को पुलिस अधीक्षक सम्मानित करेंगे।