डाला छठ पर्व के लिए अर्घ्य देने के लिए शहर के स्टीमरघाट पर सूप और दौरी खरीदतीं महिलाएं।
लोक आस्था का महापर्व डाला छठ की तैयारियों में व्रती महिलाएं लगी हुई हैं। शुक्रवार से नहाय-खाय के साथ व्रत की शुरूआत होगी। इस दौरान नदी, सरोवर तथा तालाबों पर बने छठ मईया के घाटों को संवारने में लोग अभी से जुट गए हैं। शुक्रवार को व्रती महिलाएं लौकी-भात ग्रहण कर महापर्व की शुरुआत करेंगी। घरों में अभी से छठ मईया के गीतों की गूंज सुनाई पड़ रही है।
भक्ति तथा आस्था के इस महापर्व की पवित्रता का आलम यह है कि हर कोई छठ व्रत करते वक्त तीन दिन तक अनुष्ठान में लीन रहता है। नहाय-खाय के बाद खरना के दिन नया चावल और गुड़ की खीर बनती है। जिसका सेवन व्रती महिलाएं करती हैं। साथ ही दूसरे को भी प्रसाद स्वरूप इसे दिया जाता है। इस पर्व को पूर्वांचल में विशेष रूप से मनाया जाता है। छठी मईया की पूजा करने के लिए दूसरे प्रांतों में रहने वाले लोग भी घर वापस आ जाते हैं। महापर्व के प्रथम दिन नहाय-खाय से व्रती महिलाएं छठ पर्व की शुरूआत करती हैं। सबसे पहले घर की सफाई की जाती है और उसे पवित्र किया जाता है।
इसके बाद छठ व्रत रखने वाली महिलाएं स्नान कर पवित्र तरीके से बने लौकी भात ग्रहण करती है और व्रत की शुरुआत करती हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। कई घरों में भोजन के रूप में कद्दू की सब्जी, चने की दाल, अरवा चावल भी ग्रहण किया जाता है। इस दिन शरीर और मन को शुद्ध कर व्रती महिलाएं सूर्य व्रत का संकल्प लेती हैं। दूसरे दिन व्रतधारी महिलाएं दिन भर उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करती हैं। इसे खरना कहा जाता है।