साहित्यकार डॉ. केदारनाथ सिंह ने बुधवार को कहा कि शब्द अपने आप में संपूर्ण संस्कृति है। मरते हुए शब्दों को बचाने की जरूरत है। इस क्षेत्र में अभी बहुत काम बाकी है। पूर्वांचल के विद्वानों ने हिंदी को कई शब्द दिए हैं। इसमें पराड़कर जी
के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। पीजी कालेज के टेक्निकल एजूकेशन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (टेरी) में आयोजित व्याख्यान में उन्होंने समालोचक पीएन सिंह की लिखी पुस्तक 'नामवर सिंह : संदर्भ और
विमर्श & apos; का विमोचन किया। व्याख्यान में डॉ. सिंह ने गाजीपुर की मिट्टी को नमन करते हुए कहा कि यहां से उनका लगाव है। वह बलिया के रहने वाले जरूर हैं, लेकिन उनके पुरखे गाजीपुर के ही रहे हैं। पहले बलिया गाजीपुर का
ही हिस्सा हुआ करता था। कहा कि संस्कृति, सभ्यता और साहित्य के इतिहास में गाजीपुर ही नहीं, पूरे पूर्वांचल का बड़ा योगदान रहा है। गांवों की लोक संस्कृति और जीवंतता पर कहा कि अब भी जब वह ऊब जाते हैं तो गांव चले जाते हैं,
वहां वास्तव में उन्हें ताकत मिलती है। कहा कि जो पूर्वांचल में है, वह कहीं नहीं है। कहा कि वरिष्ठ संपादक रहे बाबू विष्णु राव पराड़कर जी ने हिंदी को कई शब्द दिए। राष्ट्रपति समेत अन्य तमाम शब्दों की रचना उन्होंने ही की।
शब्द अपने आप में संपूर्ण संस्कृति है। बनारस साहित्य, कला और संस्कृति का केंद्र हैं। लोग कहते हैं बनारस बदल गया। सुना हूं वाराणसी स्मार्ट सिटी होने जा रहा है। काशी चाहे जितना बदल जाएगा, लेकिन उसका कोर (संस्कृति) कभी नहीं
मिटेगा। बनारस के गंगा घाटों पर बैठे संतों को हमेशा देखा जा सकता है। वहां की संस्कृति जिंदा है और हमेशा जिंदा रहेगी। पडरौना जिले में शिक्षण कार्य के दौरान एक छात्र के विक्षिप्त होकर कक्षा से भाग निकलने का जिक्र करते हुए कहा
कि वह अंडमान निकोबार गए थे तो एक व्यक्ति ने उन्हें गुरुजी से संबोधित करते हुए पहचानने की बात कही थी। उसने घटना की याद दिलाते हुए बताया कि वह वही छात्र है जो विक्षिप्त होकर कक्षा से भाग गया था। उसने बताया कि वह
भटकते हुए अंडमान पहुंच गया। वहां जारवा जाति के जंगली लोगों ने औषधियों से उसका इलाज किया। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ है। जारवा जाति के लोगों ने जारवा भाषा का प्रचार करने की बात कहकर उसे छोड़ा था। कहा कि तमाम
बोलियों और भाषाओं में मर रहे शब्दों को सुरक्षित रखने की जरूरत है। बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक सदानंद शाही ने कहा कि डॉ. केदारनाथ सिंह पूर्वी उत्तर प्रदेश में फिराक के बाद दूसरे सख्शियत हैं, जिन्हें ज्ञानपीठ
पुरस्कार मिला है। वे चाहे दिल्ली में रहें या दुनिया के किसी भी कोने में, उनकी कविता का संबंध पूर्वांचल से जुड़ा है। उनकी कविताओं में बुद्ध और कबीर की अनुगूंज सुनाई देती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता समालोचक पीएन सिंह और
संचालन संजय चतुर्वेदी ने किया। पीजी कालेज के प्राचार्य डा. हरिहर प्रसाद सिंह ने डा. केदारनाथ सिंह का स्वागत किया। अजीत कुमार सिंह ने आभार जताया। इस मौके पर डा. जितेंद्रनाथ पाठक, धर्मनारायण मिश्र, डा. अनिल सिंह, डा. बीडी
मिश्र, प्रो. महेेंद्र प्रताप, डा. कुलदीप पांडेय, डा. राहुल, डा. शशिभूषण पोद्दार, डा. रामनारायण तिवारी मौजूद रहे।