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सांसद व विधायक भले न बने, लेकिन इकबाल की लोकप्रियता किसी से कम नहीं

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कासिमाबाद। पूरा जीवन गरीबों के लिए समर्पित करने वाले नेताजी के नाम से मशहूर इकबाल अहमद किसी परिचय के मोहताज नहीं रहे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पूर्व सांसद सरजू पांडेय के नेतृत्व में 1957 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर दर्जनों आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए गरीबों को न्याय दिलाने का काम किया। वह सांसद, विधायक तो नहीं बन पाए लेकिन उनकी लोकप्रियता किसी से कम नहीं थी।
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इकबाल अहमद का जन्म दो फरवरी 1943 में जिले के कासिमाबाद विकासखंड के सोनबरसा गांव के एक रईस परिवार में हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, मजलूमों, दलितों को न्याय दिलाने में खपा दिया। राजनीति में सरजू पांडेय को नेता मानकर 1957 में भाकपा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक पाठशाला में पूरी हुई तथा हाईस्कूल नेशनल इंटर कॉलेज कासिमाबाद से पास किया। किसानों और मजदूरों के सवाल को लेकर लगभग एक माह तक जिला कारागार गाजीपुर में बंद रहे। रेंगा जंगल की जमीन जो लगभग 100 बीघा से भी अधिक थी को सामंतवादियों से मुक्त करा कर गरीब एवं असहाय लोगों का कब्जा कराया। 1980 के दशक में प्रदेशव्यापी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं खेत मजदूर यूनियन की तरफ से आयोजित आंदोलन में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने उनको घोड़ों से पुलिस ने रौंद दिया था। इस आंदोलन में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस आंदोलन से पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गए थे। पूर्वांचल सहकारी कताई मिल के उद्घाटन के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह को काला झंडा दिखाकर अपने दर्जनों साथियों के साथ विरोध दर्ज कराते हुए किसानों की भूमि को मुक्त कराने की मांग की थी। अंततोगत्वा संघर्षों के दौरान ही 11 अक्तूबर 2019 को उनका इंतकाल हो गया। मालूम हो कि वह सांसद, विधायक तो नहीं बन पाए लेकिन क्षेत्र में वह किसी सांसद, विधायक से कम लोकप्रिय नहीं थे। यही कारण है कि उनके इंतकाल के बाद जनाजे में जो भीड़ उमड़ी वह आज तक किसी के जनाजे में देखने को नहीं मिली।
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