सुहवल गांव के पास ठंड से बचने के लिए अलाव तापते लोग।
लगातार तीसरे दिन भी धूप नहीं निकली। रविवार को ठंड और गलन का आलम यह था कि इससे आम और खास हर कोई बेहाल था। घरों के बाहर की कौन कहे, बंद कमरे में भी ठंड और गलन पीछा नहीं छोड़ रही थी। इससे राहत के लिए तरह-तरह का जतन करने के बाद भी लोग कांपते और ठिठुरते हुए नजर आए। ठंड से पशुओं को बचाने के लिए पशु पालक मवेशियों के पास अलाव जलाने के साथ ही उन्हें कपड़े से ढंके रहे।
दिसंबर माह की शुरुआत से ही ठंड ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था। करीब एक सप्ताह से लगातार घने कोहरा का क्रम जारी था। रविवार को कोहरा तो काफी हद तक कम रहा, लेकिन गलन का जबरदस्त प्रभाव बना रहा। आलम यह था कि शरीर को पूरी तरह से कपड़ों से ढंकने के बाद भी पूरा शरीर गलन की वजह से ठंडा था। गलन का सबसे ज्यादा प्रभाव पैर और हथेली में महसूस हो रहा था। कड़ाके की ठंड में मार्गों पर वहीं लोग आवागमन करते नजर आए, जिनकी कुछ मजबूरी थी।
छुट्टी का दिन होने से अधिकांश लोग घरों में दुबके रहे। कड़ाके की ठंड से सबसे ज्यादा परेशानी वृद्धों को हो रही है। वह इससे राहत के लिए गर्म कपड़ों के साथ ही अलाव का सहारा ले रहे हैं। लगातार तीसरे दिन भी सूरज का दर्शन नहीं हुआ। जैसे-जैसे शाम होती गई, वैसे-वैसे ठंड और गलन में भी बढ़ोतरी होती गई।
ठंड से राहत के लिए एक तरफ जहां लोग तरह-तरह के उपाय कर रहे हैं, वहीं पशुपालक मवेशियों को ठंड से बचाने के लिए उनके पास अलाव जलाने के साथ ही उनके शरीर को बोरे सहित अन्य कपड़ों से ढंककर उन्हें रख रहे हैं। ठंड को लेकर लोगों में इस बात की चर्चा हो रही है कि लगता है कि इससे मकरसंक्रांति के बाद ही छुटकारा मिलेगा।