दीपावली को लेकर जहां खुशियां हिलोरे मार रही है, वहीं कुम्हार समाज अपने पुश्तैनी धंधे को लेकर उदास है। उन्हें आशंका है कि यदि हर वर्ष की तरह इस बार भी इन माटी के दीयों की पूछ नहीं हुई तो लागत डूब जाएगी और पसीना भी व्यर्थ में चला जाएगा। बाजार में माटी के दीयों की दूकान लगाने वाले कुम्हार और उनकी घरों की महिलाओं में कुछ इसी तरह की ही बेबसी दिखाई पड़ रही है।
वजह बाजार में चाइनीज इलेक्ट्रानिक दीयों, स्टील के दीए और चीनी मिट्टी की मूर्तियों के छा जाने के बाद माटी के दीयों और मूर्तियों की मांग कम हो गई है। कुम्हार सहीं मिट्टी नहीं मिल पाने के कारण मूर्तियों को नहीं तैयार कर पा रहे हैं।
एक जमाना वह भी था, जब कुम्हार की ओर से चाक पर घड़ा या कुल्हड़ गढ़ते समय जैसे ही लोगों की नजरें उन पड़ती थीं, कुछ देर लोग कुम्हार की उंगलियों की हरकतों को निहारने लगते थे, लेकिन अब प्लास्टिक के वस्तुओं और चाइनीज दीयों के बढ़ते प्रचलन के चलते चाक की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है।
नाममात्र के ही कुम्हार काफी परेशानियों के बीच मिट्टी की व्यवस्था कर मिट्टी का दीया, घड़ा, गुल्लक, कुल्हड़ आदि बना रहे हैं। प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियों के बाजार में आ जाने से अब मिट्टी के खिलौनों और गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति बनाने से भी कुम्हार समाज के लोगों का मोह भंग होने लगा है।
दो दशक पहले कुम्हारों के चाक का यह आलम था कि सुबह से लेकर शाम तक यह पूरी रफ्तार से चलते थे, लेकिन प्लास्टिक के सामानों के बढ़ते प्रचलन की वजह से अब चाक की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है।