कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से आयोजित सात दिवसीय गेहूं के बीजोत्पादन तकनीक प्रशिक्षण का समापन शुक्रवार को हुआ। समापन के अवसर पर केंद्र के सीनियर साइंटिस्ट एंड हेड डॉ. दिनेश सिंह ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण-पत्र वितरित किया। उन्होंने नवयुवकों को प्रशिक्षण के माध्यम से प्रशिक्षित होकर नवीन तकनीक को किसानों तक पहुंचाने पर बल दिया।
प्रशिक्षण में केंद्र के सस्य वैज्ञानिक डॉ. शिवकुमार सिंह ने बीजोत्पादन के लिए खेत का चयन, खेती की तैयारी, उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार प्रबंधन, सिंचाई प्रबंधन, बीजोत्पादन आदि पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि अगर बीज का शोधन कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से किया जाए तो बीज के माध्यम से फैलने वाली सभी बीमारियों को रोका जा सकता है, जिससे गेहूं की लागत को कम करने तथा उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिलती है।
खरपतवार प्रबंधन के बारे में कहा कि समय से अगर खरपतवार नियंत्रण कर लिया जाय तो 30-35 प्रतिशत उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए आइसोप्रोट्यूरान 1.5 किग्रा प्रति हेक्टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर बुआई के 30-35 दिन पर छिड़काव करते हैं, जिससे खरतवार नियंत्रण किया जा सकता है। गेहूूं की फसल की वृद्धि और विकास में सिंचाई का बहुत योगदान है। गेहूं की फसल में पहली सिंचाई 20-21 दिन पर कर देनी चाहिए, शेष सभी सिंचाई 15 से 20 दिन के अंतर पर करते हैं।
डॉ. सिंह ने बताया कि नवयुवकों को स्वरोजगार के लिए बीजोत्पादन के क्षेत्र में अधिक संभावनाएं हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा दिया जा सके। केंद्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के तहत हरी खाद की खेती, नेडेप, वर्मी कंपोस्ट, रासायनिक खादों के संतुलित प्रयोग के बारे में विस्तृत रूप से बताया। प्रशिक्षण में 17 प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया।