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Ghazipur News: यहां दशहरे के 10 दिन बाद जलता है रावण

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दुबिहा की खबर में---अशोक पांडेय। स्रोत- स्वयं
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आमतौर पर दशहरे पर रावण दहन के साथ रामलीला का समापन हो जाता है, लेकिन जिले के दुबिहां गांव में परंपरा कुछ अलग है। यहां विजयदशमी के दिन नहीं, बल्कि 10 दिन बाद रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। नवरात्र की सप्तमी के बाद शुरू होने वाली रामलीला दशहरे के बाद भी जारी रहती है। इस बार 20 अक्तूबर को दशहरा मनाया जाएगा, जबकि दुबिहां में 31 अक्तूबर को रावण के पुतले का दहन किया जाएगा।
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संत खडेश्वरी बाबा रामलीला ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष व गांव के वयोवृद्ध शिवबदन राय ने बताया कि करीब 128 वर्ष पहले महान संत खड़ेश्वरी बाबा की प्रेरणा से शुरू हुई यह परंपरा सामूहिक सहभागिता से आगे बढ़ रही है। नारद मोह प्रसंग से शुरू होने वाली रामलीला भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक तक चलती है। कलाकार दोहा-चौपाइयों के सधे हुए उच्चारण और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों को कथा के प्रसंगों से जोड़ते हैं। समय के साथ रामलीला के मंच, वेशभूषा और साज-सज्जा में बदलाव आया है, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी कायम है।
पिता बनते हैं दशरथ, बेटा निभाता है श्रीराम का किरदार
संत खडेश्वरी बाबा रामलीला ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष व गांव के वयोवृद्ध शिवबदन राय दुबिहां की रामलीला में एक ही परिवार की दो पीढ़ियां अलग-अलग भूमिकाओं के जरिये परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। गांव के अशोक पांडेय करीब एक दशक से राजा दशरथ की भूमिका निभा रहे हैं। वह बचपन से रामलीला में भाग लेते रहे हैं। अभिनय के अनुभव के आधार पर उन्हें दो भोजपुरी फिल्मों में भी छोटी भूमिकाएं मिली हैं। उनके पुत्र चंदन पांडेय श्रीराम की भूमिका निभाते हैं। चंदन का कहना है कि राम की भूमिका निभाने के लिए वह दुकान से समय निकालकर अभ्यास करते हैं। इस भूमिका से मानसिक शांति भी मिलती है।
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मुस्लिम समुदाय के लोग बनाते हैं धनुष-बाण, रावण का पुतला
संत खडेश्वरी बाबा रामलीला ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष व गांव के वयोवृद्ध शिवबदन राय के अनुसार, दुबिहां की रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक सद्भाव की भी मिसाल है। आयोजन में मुस्लिम समुदाय के लोग भी सहयोग करते हैं। नजीर अहमद, मोहम्मद यूनुस और गोलू सहित अन्य लोग पात्रों की साज-सज्जा, धनुष-बाण तैयार करने और रावण का पुतला बनाने में मदद करते हैं। आयोजन की तैयारियों में पूरे गांव की भागीदारी रहती है।
पेट्रोमैक्स से बिजली की रोशनी तक पहुंची रामलीला
संत खडेश्वरी बाबा रामलीला ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष व गांव के वयोवृद्ध शिवबदन राय ने रामलीला के पुराने और नए दोनों स्वरूपों को करीब से देखा है। उनके मुताबिक, पहले संसाधन सीमित थे। मंच से कलाकारों की साज-सज्जा तक का इंतजाम ग्रामीण मिल-जुलकर करते थे।
एक समय था, जब पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामलीला होती थी। भगवान श्रीराम का मुकुट बांस के सुपेलों से बनाया जाता था और पात्रों के चेहरे सजाने के लिए हल्दी, चूना, चंदन तथा काजल का इस्तेमाल होता था। अब बिजली की रोशनी, नए वस्त्रों और बेहतर साज-सज्जा ने मंचन को नया स्वरूप दिया है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और माता सीता की साज-सज्जा करने वाले वाल्मीकि कुशवाहा भी आयोजन को सेवा का अवसर मानते हैं।
आयोजन को हर साल बेहतर बनाने की कोशिश
संत खडेश्वरी बाबा रामलीला ट्रस्ट के अध्यक्ष गौतम राय ने बताया कि आयोजन को हर साल और आकर्षक बनाने का प्रयास किया जाता है। इस बार भी पात्रों की साज-सज्जा के लिए नए वस्त्रों और जरूरी सामग्रियों की व्यवस्था बाहर से कराई गई है। गांव के लोग अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए तैयारियों में जुटे हैं। करीब 128 वर्ष की यात्रा पूरी कर चुकी यह परंपरा आज भी ग्रामीणों को आस्था, संस्कृति और सामूहिक सहभागिता के सूत्र में बांध रही है।

दुबिहा की खबर में---अशोक पांडेय। स्रोत- स्वयं

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