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यह कैसा अस्पताल, न चिकित्सक हैं, न अल्ट्रासाउंड की जांच

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जिला अस्पताल में एक्सरे कराने के लिए बैठे मरीज। - फोटो : GHAZIPUR
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गाजीपुर। आम आदमी को बेहतर चिकित्सीय सुविधा मुहैया कराने का दावा करने वाला जिला अस्पताल खुद ही बीमार हैं। यहां सालों से डाक्टरों की कमी आम आदमी का मुख्य मुद्दा है लेकिन इसका हल किसी के पास नहीं है। आलम यह है कि वर्तमान में स्वीकृत पद के एक चौथाई भी डाक्टर तैनात नहीं है। इसके साथ अन्य समस्याओं से भी लोग जूझ रहे हैं। देखा जाए तो अल्ट्रासाउंड मशीन सालों से बंद पड़ी है। लंबे समय से बंद पड़ी ईसीजी मशीन अब जाकर चालू हुई है। स्टोर में दवाओं का भी टोटो है। मरीजों के साथ अच्छा व्यवहार न होने और दलालों की सक्रियता बढ़ने के कारण अस्पताल अक्सर विवाद में रहता है। इसका सीधा असर मरीजों और तीमारदारों पर पड़ता है। यहां तीमारदारों को महंगे दाम पर दवाएं और इंजेक्शन खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। एक्स-रे और डिजिटल एक्स-रे की सुविधा जिला अस्पताल में होते हुए भी, मरीजों को बाहर भेजा जाता है। सीधे-साधे मरीजों को दलालों के माध्यम से बरगला कर उनको जांच के लिए बाहर भेजा जाता है। मंगलवार को ‘अमर उजाला’ की टीम जब गोराबाजार स्थित जिला अस्पताल की स्थिति का जायजा लेने पहुंची तो सच्चाई सामने आई।
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सुबह साढ़े आठ बजे
जिला अस्पताल परिसर में कुछ कर्मचारी आने शुरू हो गए। मुख्य गेट खुल चुका था। चहुओर साफ-सफाई चल रही थी। ठंड की वजह से मरीजों की संख्या सुबह में बहुत कम रही। डाक्टरों की ओपीडी खुलनी शुरू हो गई। सबसे पहले मरीज पंजीकरण कक्ष खुला। इसके बाद सीटी स्कैन जांच कक्ष में कर्मचारी समय से पहुंच गए थे।
सुबह साढ़े नौ बजे
अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों ी संख्या बढ़ने लगी। ज्यादातर ओपीडी कक्ष में चिकित्सक नहीं थे। उनके इंतजार में बाहर मरीज पर्ची लेकर खड़े थे। जबकि अंदर ओपीडी में सन्नाटा पसरा था। कुछ जगह चिकित्सक अपने कुर्सी पर बैठ कर मरीजों की जांच कर रहे थे। जबकि सीनियर डाक्टर विलंब से आने के बाद विभिन्न वार्डो में भर्ती मरीजों को देखने के लिए राउंड पर निकल गए थे। डा. तनवीर अफरोज दस बजे के बाद ओपीडी में पहुंचकर मरीजों को देखना शुरू किए। जबकि डा. केके भाष्कर समय से अपनी ड्यूटी पर मौजूद थे।
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सुबह साढ़े दस बजे
सदर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की संख्या बढ़ने लगी थी। अभी भी कई डाक्टर ओपीडी में नहीं पहुंचे थे। बाहर मरीज परेशान थे। सीएमएस डा. केएन चौधरी मंगलवार को अवकाश पर थे। उनकी कुर्सी खाली थी। इनके साथ जिला अस्पताल में तैनात दो हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. आरएन सिंह तथा डा. तपीश कुमार ने एक साथ छुट्टी ले ली थी। इस कारण मरीज भटकते नजर आए।
पूर्वांह्न साढ़े 11 बजे
सदर अस्पताल में पहुंचे मरीजों को ओपीडी से देखने के बाद एक्स-रे, डिजिटल एक्स-रे, ईसीजी और सीटी स्कैन के लिए भेजा जा रहा था। मरीजों को ईसीजी और सीटी स्कैन तो समय से हो रहा था, लेकिन एक्स-रे और डिजिटल एक्स-रे का कक्ष करीब 12 बजे खुला। इस दौरान मरीज बाहर परेशान रहे। उधर, दलाल उन्हें समझा-बुझाकर प्राइवेट में एक्स-रे कराने के लिए भेज रहे थे। मरीजों को यह भी समझाया जा रहा था कि प्राइवेट में रिपोर्ट अच्छी आती है। जिला अस्पताल की रिपोर्ट सही नहीं होती।
दोपहर बाद एक बजे...
अस्पताल में मरीजों की भीड़ ही भीड़ दिखाई दे रही थी। ओपीडी कक्ष के बार मरीज इंतजार कर रहे थे, तो ईसीजी, सीटी स्कैन, डिजिटल एक्स-रे, एक्स-रे आदि कक्ष के बार भी मरीजों कतार में बैठे दिखाई दे रहे थे। इस बीच दलाल भी सक्रिय थे और मरीजों को जगह-जगह समझा-बुझा रहे थे। ओपीडी में कुछ जगह खुलेआम मरीजों को बाहर की दवाएं लिखी जा रही थी। अस्पताल की दवाओं के बेहतर काम न करने की बात बता मरीजों को महंगी दवा लेने के लिए मजबूर किया जा रहा था।
हृदयरोग विशेषज्ञ, फिजिशियन, एंटी सर्जन की व्यवस्था नहीं
जिला अस्पताल में तैनात एकमात्र सर्जन डा. जेपी राय ने दो साल पहले चार नवंबर 2017 को इस्तीफा दिया था। उनके इस्तीफा के पीछे क्या वजह रही स्पष्ट नहीं हो सका। इनके जाने के बाद अभी तक सर्जन के रूप में जिला अस्पताल में किसी की तैनाती नहीं हो सकी। इतना ही नहीं हृदयरोग विशेषज्ञ, फिजिशियन, एंटी सर्जन आदि की व्यवस्था नहीं है। पहले जिला अस्पताल 100 बेड का था और यहां चिकित्सकों के पद की स्वीकृति 27 थी। अब 200 बेड का अस्पताल बनने के बाद यहां चिकित्सकों की संख्या 54 होनी चाहिए, लेकिन अब भी 11 चिकित्सक ही पूरे जिला अस्पताल को चला रहे हैं।
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करंडा ब्लाक के मैनपुर गांव निवासी मनोज दुबे ने बताया कि अस्पताल की साफ-सफाई बहुत बहेतर है, लेकिन यहां दलालों पर कोई नियंत्रण नहीं है। दलाल चिकित्सकों के माध्यम से मरीजों को झांसे में लेकर उनसे बाहर की दवाएं लिखवाने और बाहरी जांच कराने का काम कर रहे हैं। इससे मरीजों का शोषण हो रहा है।
सदर ब्लाक के रसूलपुर निवासी सकीला बानो का कहना है कि सुबह आठ बजे से इलाज के लिए आए हैं, लेकिन डा. नेसार अहमद ओपीडी में साढ़े ग्यारह बजे के बाद बैठे हैं। कई मरीज रोग से तड़प रहे हैं, लेकिन समय से चिकित्सकों के न बैठने के कारण उन्हें अन्यत्र जाना पड़ रहा है। यह स्थिति एक-दो दिन की नहीं, लगभग रोज की है।
करंडा ब्लाक मानिकपुर कोटे गांव निवासी अभिषेक विश्वकर्मा का कहना है कि जिला अस्पताल में दवाओं का टोटा है। इसी कारण मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं लिखी जा रही हैं। यहां तक की कभी-कभी एंटी रैबीज इंजेक्शन तक नहीं मिल पा रहा है। अल्ट्रासाउंड, ईसीजी और एक्स-रे तक सभी बाहर से कराने की सलाह दी जा रही है।
मुहम्मादाबाद निवासी तालुका राय का कहना है कि जिला अस्पताल में चिकित्सकों की काफी कमी है। अस्पताल में मुख्य रूप से मरीजों को राहत देने वाले सर्जन और फिजिशियन तक नहीं है। हृदय रोग विशेषज्ञ की तैनाती भी लंबे समय से नहीं हुई है। जिला अस्पताल रेफर अस्पताल बनकर रह गया है। मरीजों को निरंतर यहां से रेफर किया जा रहा है।
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