भीमापार। गांगी नदी के जलस्तर में लगातार वृद्धि होने से तटवर्ती गांवों के रहवासियों की नींद उड़ी हुई है। पिछले साल गांगी नदी में हुए जलप्लावन से उपजे प्रलय ने जो कहर ढाया था। उसे याद करके आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हालत यह है कि नदी के बढ़ते पानी ने तटवर्ती खेतों के कुछ हिस्सों में खड़ी फसलों को जलमग्न करना शुरू कर दिया है। हालांकि पिछले साल दर्जनों गांवों के बाढ़ पीड़ितों के प्रति प्रशासन की ओर से जो लापरवाही बरती गई थी। उससे वह अब भी असंतुष्ट दिखाई पड़ते हैं।
लोगों का कहना है कि दक्षिण पश्चिम एवं उत्तर पश्चिम से गंगा, गोमती, एकौझी और गांगी आदि नदियों से घिरे होने के कारण जनपद का यह पश्चिमी क्षेत्र प्रतिवर्ष ही बाढ़ की चपेट में आ जाता है। इससे औसतन क्षेत्र का 65 प्रतिशत भाग जल प्लावित हो जाता है। गंगा की प्रमुख सहायक नदियों में गांगी नदी का नाम भी शुमार है। यह जौनपुर से दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर से आजमगढ़ की सीमा से होकर जिले में प्रवेश करती है। गाजीपुर में इसका प्रवेश स्थल नायकडीह-सोनियापार गांव है। गांगी नदी सैदपर तहसील क्षेत्र के पूर्वी सीमा से बहते हुये करण्डा के मैनपुर गांव से मोक्षदायिनी गंगा में समाहित हो जाती हैं। इस बीच लगभग 35 किलोमीटर की दूरी तय करने में गांगी नदी का पानी छोटे-बड़े लगभग 50 गांवों से होकर गुजरता है। बरसात के दिनों में लगभग एक दर्जन कैनाल और पचासों नालियों का पानी भी गांगी नदी में प्रवेश कर उसे रीचार्ज कर देता है। उपर से बरसात का पानी पाकर गांगी जब उफान मारती हैं, तब लगभग दो हजार एकड़ की खेती तहस नहस कर देती हैं। जबकि नायकडीह, सोनियापार, कूढ़ालम्बी, भुजहुंवा, भूंवरपुर, कौणियां, सोनरान, ऊचौरी, रमदसपुर, हुसैनपुर, बरहपार, दलीप राय पट्टी, मई, भीमापार, परसनी, हीरानन्दपुर, बड़िहारी, खोजनपुर, सियांवा और शिशुआचक, देवकली, पहाड़पुर, शिवदासीचक, बासूचक और मैनपुर सहित दर्जनों गांवों के लोगों को गांगी के तटवर्ती होने के कारण गांगी के बाढ़ की विभीषका प्रतिवर्ष ही झेलनी पड़ जाती है।
बाढ़ रोकने के नहीं किए जाते कोई उपाय
भीमापार। गांगी नदी हर साल सैकड़ों ग्रामीणों को भयानक तकलीफ देती रही हैं। बाढ़ से दर्जनों मकान भी धाराशायी हो चुके हैं। कईं लोग जान से भी अपना हाथ धो बैठते हैं। बावजूद शासन प्रशासन की ओर से बाढ़ के पानी को रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किए जाते हैं। हर साल लोगों को खून के आंसू बहाने पड़ते हैं। भूंवरपुर के समाजसेवी और भूतपूर्व फौजी अशोक यादव बताते हैं कि राहत सामग्री और सहायता राशि तो छोड़िए, पीड़ितों के आंसू पोछने भी यहां कोई नहीं आता है। यहां तक कि जब बाढ़ के दिनों में तटवर्ती कईं गांव एक दूसरे से कट जाते हैं। बाढ़ के पानी से उनका निकलना मुश्किल हो जाता है। तब भी गांगी के बाढ़ से प्रभावित गांवों के पीड़ितों के लिये प्रशासन की ओर से एक अदद नाव तक की व्यवस्था नहीं की जाती है।
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