बारा। माह-ए-रमजान मुबारक का पहला दिन अल्लाह की इबादत और तिलावत में बीता। नमाजियों की आमद से मस्जिदें गुलजार रहीं। रमजान के इबादत को दस-दस दिनों के तीन अशरे में तकसीम किया गया है।
पवित्र माह-ए-रमजान की आमद के साथ ही जिले सहित कमसार-ओ-बार के मुस्लिम बाहुल्य गांवों में इबादतों का दौर भी शुरू हो गया है। पांचों वक़्त की नमाज के लिए मस्जिदों में भीड़ जुटती रही। मंगलवार को पहले दिन सुबह रोजेदारों ने सहरी खाई। पुरुष मस्जिदों में तो महिलाओं ने घरों में फज्र की नमाज अदा की। बुजुर्गों से लेकर मासूम बच्चों ने भी रोजा रखकर अल्लाह के प्रति अपनी मुहब्बत का नजराना पेश किया।
इस माह बढ़ा दिया जाता है नेकियों का दायरा
दारुल उलूम अहले सुन्नत मदरसा गौसिया के प्रिंसिपल मौलाना कलीमुद्दीन शम्सी के अनुसार रमजान की इबादत दस-दस दिनों के तीन अशरों में बांटी गई है। पहला रहमत, दूसरा मगफिरत और तीसरा जहन्नम से निजात का अशरा होता है। इस महीने में की गई नेकियों का अजर बढ़ा दिया जाता है और अल्लाह एक नेकी के बदले 70 नेकियों का सवाब देता है।
बंद कर दिए जाते हैं जहन्नम के दरवाजे
मौलाना शम्सी कहते हैं कि रमजान महीने की पाकीजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अल्लाह इस महीने में शैतानों को जंजीरों में जकड़ कर जहन्नम के दरवाजे बंद कर देता है और जन्नत के दरवाजे नेक बंदों के लिए खोल देता है। उन्होंने कहा कि रमजान के रोजों की इतनी फजीलत है कि अगर कोई मुसलमान रमजान का एक रोजा जानबूझकर छोड़ दे तो पूरी उम्र रोजा रखकर भी उसके अजर के बराबर नहीं पहुंच सकता है।