गाजीपुर। जिला अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को इन दिनों बेरोकटोक बाहर की दवाएं लिखी जा रही हैं। दिन में ओपीडी एवं इमरजेंसी में चिकित्सक व कर्मचारी समय से मौजूद भी रहते हैं, लेकिन रात के वक्त इमरजेंसी में पहुंचने वालों को कोई देखने वाला तक नहीं है। दर्द से तड़पते लोगों को डाक्टर के आने काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है। संयोग से चिकित्सक मिल भी गए तो मरीज का समय से उपचार होना मुश्किल है। आलम यह है कि डाक्टर चेकअप के तत्काल बाद एक सादी पर्ची पर बाहर दवाएं आदि लिखकर लाने के लिए भेज देता है। मरीज के साथ आए लोगों को यह भी परामर्श देता है कि अस्पताल की दवाएं इन्हें काम नहीं करेंगी। इतना ही नहीं तीमारदार को संबंधित मेडिकल स्टोर का नाम-पता व लोकेशन वहां मौजूद स्टाफ व दलाल बताना नहीं भूलते। सबसे बड़ी बात यह है कि उक्त डाक्टर की लिखावट केवल वही मेडिकल स्टोर संचालक पहचानता है, जिसके यहां उनकी दोस्ती है। वहां से दवा देने के बाद मरीज को दिए गए बिल पर मेडिकल संचालक द्वारा अंग्रेजी के दो शब्द लिखे जाते है, जिसे डाक्टर के अलावा कोई नहीं पकड़ सकता। ऐसे में सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि रोजाना कमीशन खेल चल रहा है और मरीजों को नि:शुल्क इलाज और दवा देने के नाम पर छला जा रहा है। ईश्वर न करे किसी मरीज को जिला अस्पताल रात को जाना पड़े। रात के वक्त पहले चिकित्सक को खुद खोजना होगा या किसी स्टाफ से फोन करके बुलवाना होगा। इतना ही नहीं अस्पताल में किसी तरह की दवाइएं मौजूद नहीं है, यह कहकर बाहर की दवाएं लाने के लिए मजबूर किया जाएगा। गरीबों व असहायों की मदद के लिए बने सरकारी अस्पताल में भी जीवन रक्षक दवाएं बाहर से लेनी पड़ रही है। इतना ही नहीं मरीजों की जांच व दवा में कमीशन भी बंधा हुआ है। इस खेल को अंजाम देने के लिए चिकित्सक दवा का शार्ट नाम सादे पर्ची पर लिखकर मेडिकल स्टोर वाले के पास भेजता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि डाक्टरों के लिखावट की पहचान सिर्फ निजी मेडिकल स्टोर संचालक द्वारा ही किया जा सकता है। ऐसे में सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन रात के समय आपातकालीन कक्ष में पहुंचने वाले मरीज दवा में कमीशन के नाम पर वसूली कैसे कर रहे हैं ? इसी तरह का एक वाक्या शुक्रवार की देर रात करीब साढ़े 11 बजे देखने को मिला। पेट दर्द से कराह रहे एक मरीज को तत्काल दवा देने के बजाए वहां तैनात डाक्टर द्वारा बाहर से इंजेक्शन लाने की पर्ची थमा दी गई। तब-तक मरीज दर्द से कराहता रहा। निजी मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन खरीदकर आने के बाद ही स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा मरीज को सूई लगाई गई। यही नहीं मेडिकल स्टोर द्वारा दी गई दवा के मूल्य की पर्ची पर अंग्रेजी के सिर्फ डीडी दो शब्द ही लिखे हुए मिले। यह खेल रात्रि में आने वाले लगभग सभी मरीजों के साथ हो रहा था। इसी प्रकार दुर्घंटना में घायल एक व्यक्ति को टाका लगवाने के लिए सर्जरी में इस्तेमाल किए जाने वाला धागा भी बाहर से ही मंगाया गया। जबकि आपातकालीन कक्ष में आने वाले गंभीर पीड़ित मरीजों को तत्काल नि:शुल्क जीवन रक्षक दवा उपलब्ध कराने का निर्देश हैं। बावजूद कमीशन का खेल जारी है।