बलिया। कहने को शिक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन वास्तविकता में इस अधिकार से निजी स्कूल के बच्चे महंगाई के चलते वंचित हो रहे हैं। यहां तक कि काॅपी-किताबों का बोझ मध्यम वर्गीय से लेकर गरीब वर्ग के बच्चों के अभिभावकों पर बोझ बन रही है। कक्षा एक से लेकर आठ तक की पाठ्य पुस्तक के अलावा लंच बॉक्स व पानी की बोतल मिलाकर लगभग पांच से छह हजार रुपये का भारी भरकम खर्च अभिभावकों लिए चुनौती बन रहा। वहीं, दुकानों पर छूट का हवाला देकर कमीशन का खेल कर रहे हैं। कुछ प्राइवेट विद्यालय तो स्कूल में ही दुकान लगा कर बकायदा इन सामानों की बिक्री तक कर रहे है। उधर, समाजसेवी दीना भाई ने बृहस्पतिवार को जिला विद्यालय निरीक्षक को शिकायती पत्र देकर प्राइवेट और काॅन्वेंट स्कूलों द्वारा स्टेशनरी और ड्रेस आदि विद्यालय से देने और इसके नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण पर रोक लगाने की मांग की है।
स्कूलों की स्टेशनरी की दुकानें हैं चिह्नित
कोई भी दुकानदार इस बात को कहने से कतराता नजर आ रहा है कि वह किसी स्कूल को कमीशन भी देता है। लेकिन इसका अंदाजा भी इस बात से लगाया जा सकता है कि विद्यालयों की ओर से दुकानों को चिह्नित कर उनसे विद्यालय में पढ़ाई जाने वाली किताबों को ही रखने का एग्रीमेंट अंदर ही अंदर हो जाने के बाद भी संबंधित दुकानदार भी वहीं किताबें अपनी दुकान पर रखता है जो उक्त स्कूल में चलतों हों। ऐसे में आखिरी में अभिभावक ही शोषण का शिकार होकर रह जाता है।
किताबों में स्कूलों का कमीशन भी शामिल
मध्यम वर्गीय परिवार के लोगों के लिए प्राइवेट स्कूल में बच्चों की पढ़ाई करा पाना मुश्किल बना हुआ है। अहम बात यह है कि विभिन्न दुकानों पर बिक रहीं एनसीईआरटी की किताबों के अलावा काॅपियां खरीदने को लेकर दुकानदारों की ओर से 20 से लेकर 25 प्रतिशत तक का कमीशन छोड़कर अभिभावकों से हमदर्दी दिखाई जा रही है।
रोक के बावजूद करते हैं कारोबार
जिला मुख्यालय के अलावा ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट स्कूलों की भरमार हैं। इन स्कूलों के संचालक कॉपी-किताब, ड्रेस, बैग के नाम पर अभिभावकों की जेब खाली कर रहे हैं। इस सामग्री के नाम पर मनमाना दाम वसूला जा रहा है। हालांकि, स्कूलों से स्टेशनरी, ड्रेस आदि सामग्री के व्यापार पर पूरी तरह रोक है। चिह्नित दुकानों से सामग्री, किताबें, ड्रेस आदि खरीदने के लिए विवश कर रहे है।
स्कूलों में मनमानी की कहानी, अभिभावकों की जुबानी
कॉन्वेंट स्कूलों में ऐसी ड्रेस चलाई जाती है, जो स्कूल के अलावा बाहर कहीं मिले ही नहीं। संचालक समय-समय पर इनमें बदलाव करते रहते हैं, ताकि बाहर बिक्री न होने पाए।-अजीत चौबे, अभिभावक, जवहीं।
प्रवेश के समय ही स्कूलों से उस दुकान का पंपलेट उपलब्ध करा दिया जाता है, जहां से स्टेशनरी और स्कूल से संबंधित अन्य सामग्री मिलती है, जहां इसके मनमाने दाम वसूले जाते हैं।-धनजी तिवारी, अभिभावक, झंगही।
पिछली साल की तुलना में इस बार किताबों पर लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे बच्चों को अब प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना मुश्किल हो रहा है। खासकर प्राइवेट प्रकाशन की पुस्तकों की वजह से महंगाई और ज्यादा है। -ज्ञानप्रकाश तिवारी, अभिभावक, उत्तिमापुर।
प्राइवेट स्कूलों में जहां किताबों के दाम तो बड़े ही हैं। वहीं अन्य मदों के नाम पर भी काफी उगाही होती है। बच्चे को पढ़ाना मजबूरी है। ऐसे में विद्यालय प्रशासन से ज्यादा सवाल करने से बचना भी पड़ता है। -निरंजन शर्मा, अभिभावक,रतसर।
प्राइवेट स्कूलों द्वारा स्टेशनरी और ड्रेस आदि के नाम पर अभिभावकों का शोषण करने की शिकायत मिली है। जल्द ही इस पर रोक लगाने के लिए दिशा निर्देश जारी किया जाएगा। निर्देश का उल्लंघन करने वाले स्कूल संचालकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी।-रमेश कुमार सिंह, जिला विद्यालय निरीक्षक, बलिया।
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