निकाय चुनाव नजदीक है। चार मई को मतदान होना है। नामांकन की प्रक्रिया बीतते ही प्रत्याशियों को लेकर चर्चाओं का बाजार गरम है। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे प्रमुख दल के प्रत्याशी मैदान में आने के बाद समीकरण साधने की तैयारी में जुट गए हैं। शहर की सीट परंपरागत तौर पर भाजपा के खाते में रही है। 1995 से 2017 तक के पांच बार के चुनाव में लगातार भाजपा के उम्मीदवारों ने परचम लहराया है। इसमें तीन बार भाजपा के रोहिणी मुन्ना ने जीत दर्ज की। भाजपा के ही विनोद अग्रवाल और सरिता अग्रवाल ने शहर की सीट को भाजपा की झोली में डाला। इसी को देखते हुए भाजपा नेतृत्व ने एक बार फिर अग्रवाल दंपती पर भरोसा जताया है। हालांकि, सपा ने इस बार उम्मीदवार बदलते हुए दिनेश यादव पर भरोसा किया है। जबकि कांग्रेस से हामिद अली, बसपा से सुभाष चौहान और अन्य प्रमुख प्रत्याशियों में शरीफ राइनी, राजेंद्र गाजी ने नामांकन किया है। नामांकन के बाद अब कुल 15 प्रत्याशी मैदान में है। जिसमें से करीब आधा दर्जन प्रत्याशी एक दूसरे के लिए बेहद फायदेमंद और बेहद नुकसानदायक साबित होंगे। वहीं, शहर की राजनीति को समझने वाले लोगों को कहना है कि इस बार चुनाव में कोई विशेष लड़ाई नहीं है। मामला साफ है कि मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच होना है। हालांकि, लगातार कई बार से चुनाव लड़ रहे शरीफ राईनी भी शहर के पासमांदा वोटों पर सेंधमारी कर सकते हैं। ज्यादातर नुकसान सपा को हो सकता है। दूसरी ओर सालों से पासमांदा समाज पर निगाह लगाए भाजपा में भी कई पासमांदा समाज के नेता शामिल हुए है। मुस्लिमों के एकजुट होकर वोट करने का दांवा किया जा रहा है। लेकिन शहर की सीट पर शरीफ राइनी, हामिद अली जैसे मुस्मिल प्रत्याशी मैदान में होने से कितना फर्क पड़ता है। इसको देखना होगा। एक दूसरी बात जो विधानसभा चुनाव में उभर कर आई है कि सदर सीट से सपा के विधायक जैकिशुन साहू ने जीत दर्ज की। जिनकी जीत में वैश्य समाज की भूमिका मानी जा रही है। ऐसे में सपा को आस जगी है कि कुछ वैश्य वोट शहर सीट के प्रत्याशी को मिल जाए। जिसको लेकर दावा कर पाना मुश्किल होगा क्योंकि भाजपा उम्मीदवार सरिता अग्रवाल भी वैश्य समाज से आती हैं। विनोद अग्रवाल और सरिता अग्रवाल के वैश्य समाज से आने और भाजपा के परंपरागत वोट में इसकी गिनती होने से इसे मजबूत कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।