डा. विमला मिश्रा, यह उस साहस का नाम है जिसने सभी मुसीबतों को पस्त करते हुए हौसले की उड़ान भरी। कभी उनके भाइयों की नि:शक्ता ने उनकी परीक्षा ली तो कभी पिता की बीमारी ने ये सवाल पूछा कि क्या वह बेटों की तरह उनकी सेवा कर पाएंगी। लेकिन सभी आशंकाओं को दरिकनार कर ये बेटी हर परीक्षा में पास हुई।
एक तरफ जहां बीमार पिता की अंतिम क्षण तक सेवा की वहीं भाइयों की सेवा के लिए अपना घर बसाने का इरादा तक नहीं किया। आज 65 वर्ष की उम्र में भी अपने शादी न करने के फैसले से वह खुश हैं। फुर्सत के क्षण जहां उन्होंने कविता लिखने के लिए सहेज रखा है तो वहीं समाज को शिक्षित बनाने और जुल्म के खिलाफ महिलाओं को लड़ने के लिए प्रेरित कराना भी उन्हें खूब भाता है।
शहर के नियाजी मोहल्ला निवासी पंडित रामसूरत मिश्रा सोने के आभूषणों पर नक्काशी करते थे। उनके आठ संतानों में तीन पुत्र सूर्यनाथ मिश्र, लल्लन मिश्र तथा राधेमोहन मिश्र जन्म से ही मूक-बधिर थे। जबकि पांच पुत्रियों में डा. विमला मिश्रा सबसे छोटी हैं। 1969 में रामसूरत को लकवा मार गया।
काफी समय तक उनका बीएचयू में उपचार हुआ लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद वह बिस्तर पर आ गए। ऐसे हालात में भी बगैर विचलित हुए बीमार पिता, माता, बहनों और भाइयों की सेवा में तल्लीन होकर वह उच्च शिक्षा ग्रहण कर अपने पैरों पर खड़ी होने में जुट गईं। कठिन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की।
एमए, बीएड, पीएचडी की डिग्री हासिल कर 1972 में उन्हें शहर के ही राजकीय इंटर कालेज में शिक्षक पद पर नौकरी मिल गई। इस दौरान अपने माता-पिता और भाइयों की सेवा में पूर्व की भांति जुटी रहीं। अलसुबह उठकर सबके लिए नाश्ता और भोजन बनातीं। सभी को खिलाकर वह स्कूल जाती थीं और घर आने पर फिर सबकी सेवा में जुट जातीं। उन्होंने अपने पिता को एक पल के लिए इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि वह असहाय हैं।
1981 में पिता और 1983 में माता रामदुलारी मिश्रा का निधन हो गया। माता-पिता के निधन के बाद मूक-बधिर भाइयों को लेकर डा. मिश्रा की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। असहाय भाइयों को उन्होंनं माता-पिता की कमी का अहसास नहीं होनेे दिया। हालांकि इनमें से दो भाइयों सूर्यनाथ मिश्रा और लल्लन मिश्रा का निधन हो चुका है जबकि तीसरे भाई राधेमोहन मिश्रा उनके साथ ही रहते हैं। इन्हीं जिम्मेवारियों को निभाने के लिए उन्होंने शादी नहीं की।
वर्ष 2010 में राजकीय बालिका इंटर कालेज महुआबाग से प्रधानाचार्य पद सेवानिवृत्त होने के बावजूद आज भी वह अपने भाई की सेवा कर रही हैं। एक तरफ जहां आज समाज बेटी के जन्म पर मायूस हो जा रहा है, वहीं त्याग की भावना लिए हुए डा. विमला जैसी महिलाएं भगवान से अपने लिए ये ही मांगतीं हैं कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो।