गाजीपुर। जिले में मनरेगा योजना को लेकर अफसरों में सस्पेंस बरकरार है। आचार संहिता समाप्त होने के बाद भी इस योजना को लेकर अफसरों में कोई उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। एक दिन पहले डीसी मनरेगा ने भले ही बीडीओ की बैठक में योजना में तेजी लाने के निर्देश दिए हों लेकिन सभी अधिकारी अब नई सरकार के केंद्र में सत्तारूढ़ होने का इंतजार कर रहे हैं। नई सरकार के दिशा निर्देश मिलने के बाद ही योजना में तेजी के आसार दिख रहे हैं। यह स्थिति प्रदेश के सभी जिलों में देखी जा रही है।
केंद्र में दस वर्ष तक राज करने वाली संप्रग सरकार ने मनरेगा योजना योजना को वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू किया था। इस योजना को लागू करने का एक मात्र मकसद था कि योजना के माध्यम से गांव के गरीब मजदूर को उनके गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराया जाए। योजना तो काबिले तारीफ थी लेकिन इसे जिस उद्देश्य से लागू किया गया था उस ढंग से केंद्र सरकार ने लागू नहीं कराया पाया। अब तक गाजीपुर जनपद में करीब चार अरब से अधिक की धनराशि मनरेगा योजना में खर्च की जा चुकी है। लेकिन विकास की बात की जाए तो कोई भी अफसर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। बीते वर्ष करीब 58 करोड़ रुपये मनरेगा योजना में खर्च किए गए। एक अफसर से जब इस योजना के माध्यम से खर्च की धनराशि के कार्यों के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कोई संतोषजनक जबाव तो नहीं दिया। हां उन्होंने इतना जरूर कहा कि योजना में बदलाव की जरूरत है। तभी यह पता चल पाएगा कि योजना की धनराशि का सही उपयोग हुआ है या नहीं। देखा जाए तो योजना के माध्यम से गांव के मजदूरों को भी काम नहीं दिया गया। अधिकांश ग्राम पंचायतें मजदूरों के नाम से फर्जी तरीके से मजदूरी की रकम उतार ली। जांच के नाम पर अभी तक एक भी ग्राम प्रधान के विरूद्ध कार्रवाई भी नहीं की गई। इधर बीते तीन माह से मनरेगा योजना को बंद कर दिया गया था। अब योजना को शुरू करने के लिए बीते बुधवार को उपायुक्त श्रम एवं रोजगार अनय मिश्रा ने सभी बीडीओ की बैठक बुलाई थी। उन्होंने बैठक में सभी बीडीओ से कहा कि ग्राम पंचायत अधिकारियों की बैठक बुलाकर यह निर्देश दिया जाए कि प्रत्येक ग्राम पंचायतों में तीन-तीन काम शुरू किए जाएं। लेकिन अधिकांश अधिकारी केंद्र की नई सरकार के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। केंद्र ने मनरेगा योजना पर कुछ निर्देश दिया तभी इस योजना में गति दिख सकती है।