गाजीपुर। जिले में बाल विकास एवं पुष्टाहार एक ऐसा विभाग है जिसके अधिकारियों के पास सरकारी वाहन नहीं हैं। सरकारी वाहन नहीं होने से अधिकारी दो पहिया वाहनों से आंगनबाड़ी केंद्रों की जांच पड़ताल जैसे-तैसे करते हैं। अभी तक शासन ने सीडीपीओ को सरकारी वाहन नहीं उपलब्ध कराए हैं। इसकी मांग कई वर्षों से की जा रही है।
विकास भवन के द्धितीय तल पर बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कार्यालय स्थित है। इस विभाग में बीते कई माह से जिला कार्यक्रम अधिकारी का पद रिक्त चल रहा है। मौजूदा समय में जिलाधिकारी के निर्देश पर डीडीओ जिला कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। पूरे जनपद में 17 बाल विकास परियोजना कार्यालय संचालित किए जा रहे हैं। इन कार्यालयों में बाल विकास परियोजना अधिकारी, दो बाबू और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तैनाती की गई है। सीडीपीओ कार्यालयों से जिले के 4218 आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन किया जाता है। इन केंद्रों पर एक वर्ष से पांच वर्ष तक के 40-40 बच्चों का पंजीकरण कराया गया है। नौनिहालों का स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए प्रोटीन युक्त पंजीरी और हाटकुक्ड के वितरण का निर्देश है। इस समय बीते तीन माह से हाटकुक्ड का संचालन बजट के अभाव में बंद पड़ा हुआ है। इसके साथ ही समय-समय पर टीका लगवाने के साथ ही बच्चों के स्वास्थ्य की भी जांच होती है।
इस विभाग का गठन सिर्फ इसलिए किया गया था कि गांव गरीब के बच्चों को कुपोषण मुक्त बनाया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर योजनाओं के संचालन के लिए सीडीपीओ को निर्देश दिए गए हैं। लेकिन बीते कई वर्षों से 17 परियोजनाओं में वाहन नहीं हैं। वाहन नहीं होने से सीडीपीओ अपने निजी वाहन से केंद्रों परकिसी तरह निरीक्षण करने के लिए जाते हैं। जिन सीडीपीओ के पास वाहन नहीं है वे बाइक से केंद्र पर पहुंचते हैं। बीते वर्ष शासन ने आदेश जारी कर कहा था कि टैक्सी में पास वाहनों को किराए पर लेने की छूट दी जाएगी। इसके लिए धनराशि भी भेजी गई। लेकिन विभागीय अधिकारियों की लापरवाही से बजट को मार्च में वापस कर दिया गया। विभाग को टैक्सी में पास वाहन मिले ही नहीं।
इसकी जानकारी जब प्रभारी डीडीओ को हुई तो उन्होंने आश्चर्य जताया। बोले, विभाग के अधिकारियों ने बहुत ही लापरवाही की है। जब शासन वाहन किराए पर लेने के लिए बजट दे रहा है तो वाहन अवश्य लेना चाहिए। इस संबंध में प्रभारी डीपीओ एससी राय ने बताया कि शासन को पत्र लिखकर दोबारा किराए पर वाहन लेने की सिफारिश की जाएगी। जबकि विभागीय कर्मियों का तर्क था कि टैक्सी में पास वाहन नहीं मिल रहे थे इसलिए पैसा वापस करना पड़ा।