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आजाद हिंद फौज के सिपाही थे जव्वाद खां

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बारा(गाजीपुर)। आजादी की लड़ाई में बारा क्षेत्र के क्रांतिकारियों ने भी जान की बाजी लगा दी थी। उनके बहादुरी के किस्से लोग आज भी शान से सुनते हैं और सुनाते हैं। आजाद हिंद फौज से जुड़े बारा निवासी जव्वाद खां का नाम लोग आज भी फक्र से लेते हैं। जव्वाद खां अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी थी। जिससे वह उनकी नजर में चढ़ गए। गोरों की सरकार ने उन्हें हिरासत में ले लिया तथा फांसी की सजा सुनाई थी। यह सजा कई क्रांतिकारियों को सुुनाई गई थी। लेकिन इसके बाद जव्वाद खां के साथियों के नेतृत्व में देशव्यापी क्रांति की लपट ने ब्रिटिश हुकूमत को हीलाकर रख दिया। जिससे फांसी की सजा वापस लेनी पड़ी। आजादी के पर्व पर हम उन्हें आज भी याद करते हैं। उनकी शहादत आज भी जनपदवासियों के लिए एक मिसाल है। आज भी नौघर घराने के परिवार के लोग उन पर गर्व महसूस करते हैं।
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1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन, सब में यहां के लोगों की भागीदारी रही है। इसके लिए अतिरिक्त ओलमाएं सादिकपुर के सहयोग एवं समर्थन में बारा के लोगों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। जंग- ए-आजादी में योगदान भारतीय इतिहास में बारा का नाम स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है। जव्वाद खां का जन्म 1915 में मुहम्मद यार खां के घर हुआ था। 21 अक्टूबर 1943 में ब्रिगेडियर शाहनवाज खान के नेतृत्व में जब सेना में विद्रोह हुआ तो विद्रोही सैनिक नेताजी सुभाष चंद्रबोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। स्वतंत्रता संग्राम के जोश से भरपूर बहादुर जवान जव्वाद खां इन्हीं विद्रोही सैनिकों में शामिल थे। 1945 में अंग्रेजों ने इन बागी फौजियों को गिरफ्तार कर लिया। जिसमें जव्वाद खां भी शामिल रहे। उन पर अंग्रेजी सरकार ने बागी होने का आरोप लगाते हुए मुकदमा चलाया। स्वतंत्रता आंदोलन के उन विद्रोहियों के पक्ष में उस समय के सबसे अच्छे वकीलों में शामिल भोला भाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू और एन काटजू ने उनका बचाव किया था। लेकिन सभी विद्रोहियों को फांसी की सजा हो गई। इस फैसले के खिलाफ जनता आक्रोशित और चिंतित थी। इसके बाद एक देशव्यापी आंदोलन चला। एक नारा चला कि लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद फौज छोड़ दो। देश की जनता की जागरूकता और बेचैनी से घबराकर तत्कालीन वायसराय लार्ड वेवेल को अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए दंडित विद्रोहियों की फांसी की सजा को माफ करना पड़ा।
जव्वाद खां का देहांत बारा में ही 1987 में हुआ। उन्हें उनके पैतृक कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक़ किया गया। स्वतंत्रता संग्राम के इस बहादुर सिपाही जव्वाद खां को आजीवन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पेंशन मिलता रहा। जव्वाद खां के एक पुत्र इस्माइल खां है। इस्माइल खां के चार पुत्र हैं, जो कामयाब हैं। उनका पूरा परिवार सुखी है। लेकिन इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर कोई स्मृति न बनाए जाने का उन्हें दु:ख है। इस्माइल खां का कहना है कि पिता जी की स्मृति में कोई स्मारक अथवा याद में और कुछ बनाया जाना चाहिए, लेकिन यह सम्मान आज तक उनको नहीं मिला। यह उपेक्षा उनके मन को कचोटता है।
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