कासिमाबाद (गाजीपुर)। बाराचवर विकासखंड का एक छोटा माटा गांव पचास वर्षों से आपसी सौहार्द की मिसाल पेश करता आ रहा है। एक तरफ जहां मंदिर में होली के गीत गाए जाते हैं। वहीं चौक पर ताजिया रखकर मुस्लिम समुदाय के लोग लकड़ी का करतब दिखाते हैं। दोनों समुदाय की ओर से गंगा जमुनी तहजीब के साथ-साथ आज भी भाईचारे की मिसाल पेश की जाती है।
बरेसर थाना क्षेत्र का मांटा गांव आज से 50 वर्ष पूर्व होली और मुहर्रम की दसवीं यानी कत्ल की रात के त्यौहार की परंपरा जीवित रखे हुए हैं। ग्रामीणों के अनुसार होली और मुहर्रम एक साथ पड़ा था। इसको लेकर दोनों पक्षों में काफी तनातनी और विवाद हो गया था। दोनों पक्षों की मर्यादाओं को बचाते हुए तत्कालीन प्रशासन ने व्यवस्था दी कि दोनों पक्ष आपस में टकराव से बचेंगे तथा अपना-अपना त्योहार सकुशल संपन्न कराएंगे। इसी समझौते के तहत हिंदू वर्ग के लोगों को रात 10 बजे तक रामजानकी मंदिर पर होली के गीत गाने की इजाजत दी गई और मुस्लिम वर्ग को उसके बाद चौक पर ताजिया रखकर मातम मनाते हुए खेल आदि करने का समय दिया गया। यह समय मुहर्रम की नौवीं यानी कत्ल की रात के लिए ही निर्धारित किया गया। उस समय प्रशासन द्वारा लिए गए फैसले को परंपरा के रूप में अपनाते हुए दोनों वर्ग उसको आज भी निभा रहे हैं। हिंदू वर्ग कत्ल की रात होली के गीत गाकर खुशियां मनाता है, तो मुस्लिम वर्ग उसके बाद अपनी ताजियों को लाकर चौक पर रखकर मातम करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। यह परंपरा आज लगातार 50 वर्षों से चली आ रही है। ग्रामीण भी इसका बेसब्री से इंतजार करते हैं। इस बात का उल्लेख बरेसर थाने के त्यौहार रजिस्टर में भी दर्ज है। जबकि पुलिस एवं प्रशासन सुरक्षा के दृष्टिकोण से खास इंतजाम करता है। इस खास अवसर को दोनों समुदाय काफी संजीदगी और तहजीब के साथ इस परंपरा को कायम रखकर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश कर रहे हैं।