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रुद्र महायज्ञ के लिए निकाली गई कलश यात्रा

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क्षेत्र के असावर स्थित बुढ़वा शिव मंदिर पर रुद्र महायज्ञ के लिए सोमवार को अयोध्या से आए संत महामडंलेश्वर शिवरामदास फलहारी बाबा के नेतृत्व में हाथी-घोड़े और बाजे-गाजे के साथ कलश यात्रा निकाली गई। यात्रा में शामिल सैकड़ों महिला-पुरुष हाथों में कलश लेकर चल रहे थे। यात्रा जिस रास्ते से गुजर रही थी, वहां का वातावरण भक्तिमय हो जा रहा था। तेज धूप के बावजूद कलश यात्रा में शामिल महिला और पुरुषों की कतार घंटों चलती रही।
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असावर स्थित बुढ़वा शिव मंदिर से सैकड़ों महिला-पुरुषों के साथ यज्ञ स्थल से निकली कलश यात्रा विभिन्न मार्गों से होते हुए गौसपुर स्थिति गंगा घाट पर पहुंची। यहां पर श्रद्धालु कलश में जल भर कर पुन: यज्ञ स्थल के लिए रवाना हुए। यज्ञ स्थल पर पहुंचने पर मंत्रोच्चार के बीच कलश स्थपित हुआ। यात्रा जिस रास्ते से भी गुजर रही थी, वातावरण भक्तियम बन जा रहा था। इस मौके पर महामडंलेश्वर शिवराम दास फलहारी बाबा ने प्रवचन करते हुए कहा कि रूद्र महा यज्ञ के कलश यात्रा के माध्यम से परिक्रमा प्रणाम और प्रसाद के द्वारा दैहिक, दैविक तथा भौतिक ताप, संताप, परिताप तीनो कष्ट कम होता है। गंगा विष्णुपदी हैं। डुबकी लगाते ही शिव का रूप तथा कमंडल या कलश में लेकर चलने पर बह्मा का रूप प्रदान करती है। गंगा की अविरल धारा हम सब को निरंतर कर्म की प्रेरणा देती है। गंगा की शुद्धता औगुणों से दूर रहते हुए भक्ति परोपकार दूसरों की सहायता करुणा का संदेश देती है। जैसे गंगा हरिद्वार से चलकर प्रयाग होते हुए सभी बाधाओं का सामना करते हुए सागर में समाहित होकर सागर बन जाती है। वैसे ही हम मनुष्यों के जीवन में विश्वास के साथ कर्म हो तो कठिनाई के बावजूद भी लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। कलयुग में कर्म युक्त विश्वास ही फल बन जाता है। विश्वास नि :संदेह हो, संदेहात्मक नहीं होना चाहिए। संदेह शंका ही विनाश का कारण बनता है। कहा कि गीता में भगवान ने कहा है कि शंकायुत्त जीवत्मा विनाश को प्राप्त होता है। अत: विश्वास अचल, अटल और अडिग होना चाहिए। किसी भी विषम परिस्थिति में चलायमान और डिगायमान नहीं होना चाहिए।
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